भोपाल, 27 जून।
मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में खाद्यान्न खरीद की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसानों से समर्थन मूल्य पर गेहूं और धान की खरीद कर उन्हें उचित मूल्य दिलाना सरकार की प्रमुख जिम्मेदारी है। इस कार्य के लिए गठित संस्थाओं और निगमों को वित्तीय रूप से सक्षम और पारदर्शी होना चाहिए, ताकि किसानों के हितों की रक्षा के साथ-साथ सार्वजनिक धन का भी समुचित उपयोग हो सके। किंतु जब कोई सरकारी निगम स्वयं भारी कर्ज के बोझ तले दब जाए और उसकी आय से अधिक ब्याज भुगतान होने लगे, तो यह केवल एक संस्था की समस्या नहीं रह जाती, बल्कि पूरे वित्तीय प्रबंधन पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर देती है।
राज्य में खाद्यान्न खरीद और भंडारण से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में शामिल राज्य नागरिक आपूर्ति निगम पर बढ़ता कर्ज चिंता का विषय बन गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, निगम पर कर्ज का बोझ एक लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका है और प्रतिदिन करोड़ों रुपये ब्याज के रूप में चुकाने पड़ रहे हैं। यह स्थिति तब और अधिक गंभीर दिखाई देती है, जब निगम की नियमित आय सीमित हो और ऋण भुगतान का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा हो।
किसी भी व्यावसायिक या अर्ध-व्यावसायिक संस्था का मूल सिद्धांत यह होता है कि उसकी आय और व्यय के बीच संतुलन बना रहे। यदि संस्था लगातार ऋण लेकर अपने दायित्वों का निर्वहन कर रही है, तो यह संकेत है कि उसके वित्तीय ढांचे में कहीं न कहीं संरचनात्मक कमजोरी मौजूद है। खाद्यान्न खरीद का कार्य हर वर्ष नियमित रूप से होता है और इसके लिए केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा विभिन्न वित्तीय व्यवस्थाएं भी की जाती हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि खरीद प्रक्रिया एक स्थापित व्यवस्था के अंतर्गत संचालित हो रही है, तो कर्ज का बोझ इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहा है।
इस समस्या का एक पक्ष यह भी है कि खाद्यान्न खरीद में बड़ी मात्रा में कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती है। किसानों को भुगतान तत्काल करना पड़ता है, जबकि केंद्र सरकार अथवा अन्य एजेंसियों से राशि प्राप्त होने में समय लग सकता है। इस अंतर को भरने के लिए निगम बैंक ऋण लेता है। यदि भुगतान में देरी लंबी हो जाए तो ब्याज का बोझ बढ़ना तय है, लेकिन जब यही प्रक्रिया वर्षों तक जारी रहे और ऋण का आकार लगातार बढ़ता जाए, तो यह केवल अस्थायी नकदी संकट नहीं, बल्कि वित्तीय प्रबंधन की चुनौती बन जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी निगमों की सबसे बड़ी समस्या जवाबदेही का अभाव है। निजी क्षेत्र में घाटा होने पर प्रबंधन पर तुरंत दबाव बनता है और सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं, जबकि सरकारी संस्थाओं में अक्सर घाटे और बढ़ते कर्ज को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया मान लिया जाता है। परिणामस्वरूप समय रहते सुधार नहीं हो पाते और स्थिति विकराल रूप धारण कर लेती है। खाद्यान्न खरीद व्यवस्था में पारदर्शिता भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। अतीत में खरीद दरों, भंडारण व्यवस्था, परिवहन लागत और गुणवत्ता परीक्षण को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। यदि खरीद प्रक्रिया में किसी भी स्तर पर अनावश्यक खर्च बढ़ता है, तो उसका सीधा प्रभाव निगम की वित्तीय स्थिति पर पड़ता है। इसलिए केवल ऋण की राशि पर चर्चा पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी आवश्यक है कि खर्च बढ़ने के वास्तविक कारणों की निष्पक्ष जांच की जाए।
वित्तीय विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि किसी संस्था की सफलता केवल उसके कारोबार के आकार से नहीं, बल्कि उसकी वित्तीय स्थिरता से मापी जाती है। यदि कोई निगम हजारों करोड़ रुपये का कारोबार कर रहा हो, लेकिन उसे लगातार ऋण लेकर काम चलाना पड़ रहा हो, तो उसकी कार्यप्रणाली की समीक्षा आवश्यक हो जाती है। सार्वजनिक धन का उपयोग करते समय पारदर्शिता और दक्षता दोनों अनिवार्य हैं, क्योंकि अंततः यह धन करदाताओं की जेब से ही आता है।
सरकार के लिए यह स्थिति एक चेतावनी भी है। राज्य पर पहले से ही विकास योजनाओं, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों और बुनियादी ढांचे के विस्तार का वित्तीय दबाव है। ऐसे में यदि सार्वजनिक उपक्रमों का कर्ज लगातार बढ़ता रहेगा, तो उसका प्रभाव राज्य की समग्र वित्तीय स्थिति पर भी पड़ सकता है। ब्याज भुगतान में जाने वाला धन विकास कार्यों के लिए उपलब्ध संसाधनों को सीमित कर देता है।
समाधान की दिशा में सबसे पहले निगम के वित्तीय लेखा-जोखा का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाना चाहिए। यह स्पष्ट होना चाहिए कि ऋण वृद्धि के पीछे कौन-कौन से कारण जिम्मेदार हैं और किन क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है। साथ ही, खरीद, भुगतान और भंडारण से जुड़ी प्रक्रियाओं को अधिक तकनीक-आधारित और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए, ताकि अनावश्यक लागत कम हो सके। केंद्र और राज्य सरकार के बीच भुगतान समन्वय को भी मजबूत करना होगा, जिससे ऋण लेने की आवश्यकता न्यूनतम रहे। इसके अतिरिक्त, निगमों के लिए दीर्घकालिक वित्तीय अनुशासन की नीति तैयार की जानी चाहिए। प्रत्येक वर्ष ऋण सीमा, ब्याज भार और परिचालन लागत की सार्वजनिक समीक्षा हो तथा उसके आधार पर सुधारात्मक कदम उठाए जाएं। जवाबदेही तय किए बिना किसी भी वित्तीय संकट का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
अंततः यह प्रश्न केवल एक निगम का नहीं, बल्कि सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन की विश्वसनीयता का है। किसानों को समय पर भुगतान और खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन इसके साथ-साथ वित्तीय अनुशासन भी उतना ही आवश्यक है। यदि बढ़ते कर्ज और ब्याज के बोझ को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो इसका प्रभाव भविष्य में राज्य की आर्थिक क्षमता और विकास योजनाओं पर भी पड़ सकता है। इसलिए आवश्यक है कि इस मुद्दे को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर प्रशासनिक दक्षता, वित्तीय पारदर्शिता और संस्थागत सुधार के अवसर के रूप में देखा जाए, ताकि सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग अधिक जिम्मेदारी और प्रभावशीलता के साथ हो सके।














