सरकार व नीतियाँ
27 Jun, 2026

राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल हुआ मध्य प्रदेश का मैहर बैंड

भारत सरकार ने मध्य प्रदेश के विश्वविख्यात मैहर बैंड को राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया है तथा इसकी संगीत परंपरा के संरक्षण के लिए गुरुकुल की स्थापना भी की जा रही है।

भोपाल, 27 जून।

मध्य प्रदेश की समृद्ध संगीत परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर एक और महत्वपूर्ण पहचान मिली है। मैहर वाद्यवृंद (मैहर बैंड) को भारत सरकार ने राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (आईसीएच) की सूची में शामिल किया है। मां शारदा की नगरी मैहर की इस ऐतिहासिक संगीत धरोहर को मिला यह सम्मान प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

संस्कृति विभाग के अनुसार, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की लोक कला और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण की नीति के तहत किए जा रहे प्रयासों का यह महत्वपूर्ण परिणाम है। अपर मुख्य सचिव संस्कृति, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व तथा सामान्य प्रशासन शिव शेखर शुक्ला ने मैहर बैंड से जुड़े कलाकारों और शासकीय संगीत महाविद्यालय, मैहर को इस उपलब्धि पर बधाई दी है। इससे पहले प्रदेश की भगोरिया नृत्य और गोंड चित्रकला को भी राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में स्थान मिल चुका है।

संस्कृति विभाग प्रदेश की सांस्कृतिक परंपराओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए लगातार कार्य कर रहा है। इसी क्रम में विभाग को अब तक सात गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड भी प्राप्त हो चुके हैं। मैहर बैंड की परंपरा को सुरक्षित रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के उद्देश्य से शासकीय संगीत महाविद्यालय, मैहर में गुरुकुल की स्थापना की जा रही है। इस व्यवस्था के माध्यम से युवा कलाकार मैहर बैंड की विशिष्ट संगीत शैली, रागों और गुरु-शिष्य परंपरा का प्रशिक्षण प्राप्त कर सकेंगे।

मैहर बैंड का इतिहास एक शताब्दी से अधिक पुराना है। इसकी स्थापना वर्ष 1918 में महान संगीताचार्य उस्ताद अलाउद्दीन खां ने मैहर रियासत के तत्कालीन महाराजा बृजनाथ सिंह जूदेव की प्रेरणा से की थी। भारतीय शास्त्रीय संगीत में इसे विश्व का पहला शास्त्रीय वाद्यवृंद माना जाता है। पिछले 108 वर्षों में इस वाद्यवृंद ने अपनी मौलिक पहचान और शास्त्रीय परंपरा को निरंतर बनाए रखा है तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी कलाकारों ने इसकी विरासत को संजोकर रखा है।

इस वाद्यवृंद की विशेष पहचान इसके दुर्लभ वाद्ययंत्र और उस्ताद अलाउद्दीन खां द्वारा तैयार की गई विशेष शास्त्रीय बंदिशें हैं। इसमें सितार, सरोद, इसराज, वायलिन, चेलो, सितार-बैंजो, हारमोनियम और तबला जैसे वाद्यों का अनूठा समन्वय देखने को मिलता है। इनमें सबसे विशिष्ट नलतरंग है, जिसे बंदूक की नालियों को स्वरबद्ध कर तैयार किया गया था। यह दुर्लभ वाद्य आज भी केवल मैहर बैंड में ही देखने को मिलता है।

वर्ष 1924 में लखनऊ के केसरबाग में आयोजित भातखंडे समारोह में प्रस्तुति के बाद मैहर बैंड को राष्ट्रीय पहचान मिली थी। इसके बाद इस वाद्यवृंद ने देश के अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी कला का प्रदर्शन किया। वर्ष 2016 में मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग ने इसके उल्लेखनीय योगदान के लिए इसे शिखर सम्मान से सम्मानित किया था। वर्तमान में संस्कृति विभाग के संरक्षण में मैहर बैंड भारतीय शास्त्रीय संगीत की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते हुए विश्व स्तर पर मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को सशक्त बना रहा है।

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