भोपाल, 29 जून।
मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव लगातार हर मंच से दोहराते रहे हैं। उनकी मंशा स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार समाप्त हो और जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ सीधे आम जनता तक पहुंचे। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर पेश करती है। लोकायुक्त और अदालतों के नोटिसों के बावजूद कई आरोपी जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं और कार्रवाई वर्षों से लंबित है। स्थिति यह है कि 16 वर्ष पुराने भ्रष्टाचार के मामले भी आज तक अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इस दौरान कई आरोपी अधिकारी और कर्मचारी सेवानिवृत्त होकर पेंशन का लाभ उठा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब शीर्ष स्तर पर इच्छाशक्ति मौजूद है, तो व्यवस्था में इतनी सुस्ती क्यों है।
भ्रष्टाचार के मामलों में जांच की धीमी गति व्यवस्था की गंभीर कमजोरी को उजागर करती है। कई मामलों में वर्षों बाद भी आरोप-पत्र प्रस्तुत नहीं हो पाया है, जबकि अभियोजन की अनुमति भी लंबे समय तक लंबित रहती है। मुख्यमंत्री लगातार समीक्षा बैठकें कर रहे हैं और भ्रष्टाचारियों को कड़ा संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन वह संदेश निचले स्तर तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पा रहा है। फाइलें एक मेज से दूसरी मेज तक घूमती रहती हैं और आरोपी खुलेआम घूमते रहते हैं।
सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि लोकायुक्त और अदालत के नोटिसों का भी अपेक्षित प्रभाव दिखाई नहीं देता। कई मामलों में बीमारी, स्थगन और अन्य प्रक्रियागत कारणों से सुनवाई टलती रहती है। परिणामस्वरूप न्याय में लगातार देरी होती है। यदि किसी अधिकारी पर आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज होने के बाद भी वह बिना किसी ठोस कार्रवाई के सेवानिवृत्त होकर पेंशन प्राप्त करता रहे, तो यह व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। जांच में देरी केवल न्याय में देरी नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के प्रति गलत संदेश भी है।
इस स्थिति से सबसे अधिक नुकसान शासन की विश्वसनीयता को होता है। जब छोटा कर्मचारी देखता है कि बड़े अधिकारी पर वर्षों तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, तो व्यवस्था के प्रति उसका विश्वास भी कमजोर पड़ता है। आम जनता भी यही देखती है कि भ्रष्टाचार के आरोपी अब भी कानून की पकड़ से बाहर हैं। इससे सरकार की छवि और भ्रष्टाचार विरोधी अभियान दोनों प्रभावित होते हैं।
अब आवश्यकता केवल समीक्षा बैठकों की नहीं, बल्कि समयबद्ध और जवाबदेह व्यवस्था की है। लंबित मामलों की नियमित समीक्षा हो, जांच और अभियोजन की प्रक्रिया तय समय-सीमा में पूरी की जाए तथा अनावश्यक विलंब के लिए संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल ईमानदार नेतृत्व से नहीं, बल्कि प्रभावी और उत्तरदायी प्रशासनिक तंत्र से जीती जा सकती है। जनता अब घोषणाओं से अधिक परिणाम देखना चाहती है और यही किसी भी भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की वास्तविक कसौटी होगी।















