विजयनगरम, 30 जून।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने मंगलवार को आंध्र प्रदेश के विजयनगरम स्थित केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह में कहा कि केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय जनजातीय समाज के आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और नीति निर्माण में भागीदारी का प्रमुख केंद्र बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा के माध्यम से जनजातीय समुदायों के समग्र विकास को गति देने में ऐसे संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
राष्ट्रपति ने कहा कि जनजातीय विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी केवल उच्च शिक्षा उपलब्ध कराना नहीं है। उन्हें शिक्षा के साथ स्वास्थ्य, कौशल विकास, आजीविका, वनाधिकार और सामाजिक सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में भी जमीनी स्तर पर कार्य करना चाहिए। उन्होंने विश्वास जताया कि विश्वविद्यालय भविष्य में जनजातीय युवाओं के सर्वांगीण विकास और क्षेत्र की प्रगति में अहम योगदान देगा।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को वन उपज, हस्तशिल्प, मिलेट, औषधीय पौधों, इको-टूरिज्म और स्थानीय उद्यमिता जैसे क्षेत्रों को बढ़ावा देने वाली नवाचारी पहल करनी चाहिए। इससे जनजातीय समाज की आजीविका मजबूत होगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा मिलेगी।
राष्ट्रपति ने विद्यार्थियों से कहा कि दीक्षांत समारोह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है और उन्हें बदलते समय के अनुरूप नए कौशल विकास पर लगातार ध्यान देना चाहिए। उन्होंने पुस्तकीय ज्ञान के साथ व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने और अपनी संस्कृति, परंपराओं तथा समुदाय से जुड़े रहने की भी सलाह दी।
उन्होंने कहा कि विकसित भारत के निर्माण के लिए सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक विज्ञान के बीच संतुलन आवश्यक है। इसी उद्देश्य से विश्वविद्यालय उत्तरी आंध्र प्रदेश के जनजातीय समुदायों के लिए 'साइंस एंड टेक्नोलॉजी हब' संचालित कर रहा है। उन्होंने बताया कि संस्थान जनजातीय कल्याण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा ऊर्जा संरक्षण जैसे विषयों पर भी कार्य कर रहा है।
राष्ट्रपति ने विश्वास व्यक्त किया कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में जनजातीय विश्वविद्यालय महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि समावेशी, व्यावहारिक और पर्यावरण आधारित शिक्षा के माध्यम से जनजातीय युवाओं को सशक्त बनाकर देश के संतुलित और समतापूर्ण विकास में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है।
















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