भोपाल, 11 जुलाई।
मध्यप्रदेश सरकार ने ग्रामीण आबादी की भूमि पर वर्षों से काबिज 48 लाख से अधिक परिवारों को मालिकाना हक दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। तहसीलदार, प्रभारी तहसीलदार और नायब तहसीलदार को भी सब रजिस्ट्रार की शक्तियां देकर सरकार ने रजिस्ट्री की प्रक्रिया को तेज और सरल बनाने का प्रयास किया है। साथ ही स्टाम्प ड्यूटी, पंजीयन शुल्क और पंचायत उपकर माफ कर गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ भी कम किया गया है। यह निर्णय ग्रामीणों के लिए बड़ी राहत साबित हो सकता है।
अब तक सीमित संख्या में सब रजिस्ट्रार कार्यालय होने के कारण लोगों को महीनों इंतजार करना पड़ता था। नई व्यवस्था से रजिस्ट्री की प्रक्रिया गांवों के अधिक करीब पहुंचेगी और लोगों को अनावश्यक दौड़-भाग से राहत मिलेगी। सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि मालिकाना हक मिलने के बाद ग्रामीण अपनी जमीन के आधार पर बैंक से ऋण लेकर मकान निर्माण, कृषि और छोटे व्यवसाय के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकेंगे।
किसी भी अच्छी योजना की सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि अधिकार अभिलेख बनाने से लेकर रजिस्ट्री तक की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी, समयबद्ध और भ्रष्टाचार मुक्त हो। यदि राजस्व कार्यालयों में दलाल सक्रिय रहे या पात्र लोगों को अनावश्यक आपत्तियों और कागजी औपचारिकताओं में उलझाया गया, तो इस महत्वाकांक्षी योजना का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
सरकार ने इस योजना पर लगभग 3800 करोड़ रुपये का वित्तीय भार उठाने का निर्णय लिया है। इसलिए यह आवश्यक है कि इसका लाभ वास्तव में उन परिवारों तक पहुंचे, जो वर्षों से अपनी ही जमीन पर कानूनी मालिकाना हक के इंतजार में हैं। यदि पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ इस योजना को लागू किया गया, तो यह केवल मुफ्त रजिस्ट्री की योजना नहीं रहेगी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और लोगों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल साबित हो सकती है।









