लखनऊ, 11 जुलाई।
अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत ने एमआरपी (MRP) व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार से कड़े कदम उठाने की मांग की है। संगठन का आरोप है कि ग्राहकों को राहत देने के लिए बनी यह व्यवस्था अब कंपनियों के लिए 'लूट का लाइसेंस' बन चुकी है।
संगठन के अनुसार, निर्माता अपनी मनमर्जी से कीमतें तय कर रहे हैं, जिसका असर दवाओं, कॉस्मेटिक्स और रेडीमेड कपड़ों पर अधिक दिख रहा है। ग्राहक पंचायत का सुझाव है कि एमआरपी को निर्माता की इच्छा पर छोड़ने के बजाय इसे उत्पादन लागत के आधार पर तय करने का कानून बनाया जाए।
संगठन के नीतीश कुमार पाण्डेय ने कहा कि बाजार में पारदर्शिता लाने के लिए एक नियामक आयोग का गठन होना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया बेहद पारदर्शी है और वहां फर्जी छूट पर सख्ती की जाती है।
वर्तमान में एमआरपी से अधिक दाम लेने पर उपभोक्ता फोरम का रास्ता है, लेकिन कानूनी जटिलताओं के चलते आम आदमी इससे दूर रहता है। ग्राहकों का मानना है कि यदि मूल्य निर्धारण का ढांचा पारदर्शी और समान होगा, तो छोटे व्यापारियों को भी निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का मौका मिलेगा।
ग्राहक पंचायत का स्पष्ट मानना है कि यदि सरकार एक स्वायत्त बोर्ड बनाकर एमआरपी के मानकों की निगरानी करे, तो अनुचित मुनाफाखोरी पर लगाम लग सकेगी। इससे न केवल उपभोक्ता हितों की रक्षा होगी, बल्कि भारतीय बाजार में पारदर्शिता और विश्वास का माहौल भी मजबूत होगा।










