मुंबई, 23 जुलाई।
देश के राज्यों की आर्थिक स्थिति आज ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां एक ओर जनता को राहत देने के नाम पर मुफ्त योजनाओं की बाढ़ है और दूसरी ओर सरकारी खजाने पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ताजा रिपोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि चुनावी प्रतिस्पर्धा में घोषित की जा रही लोकलुभावन योजनाएं अब कई राज्यों के लिए गंभीर वित्तीय संकट का कारण बन रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, बिना ठोस वित्तीय योजना के मुफ्त सुविधाएं बांटने और लगातार कर्ज लेने की प्रवृत्ति ने अनेक राज्यों की आर्थिक स्थिति कमजोर कर दी है। यदि समय रहते वित्तीय अनुशासन नहीं अपनाया गया, तो आने वाले वर्षों में कई राज्यों के लिए वेतन, पेंशन और विकास कार्यों का खर्च उठाना भी कठिन हो सकता है।
पिछले कुछ वर्षों में राज्यों के बीच यह प्रतिस्पर्धा बढ़ी है कि कौन अधिक मुफ्त सुविधाएं दे सकता है। मध्य प्रदेश में लाड़ली बहना योजना, झारखंड में मैया सम्मान, हरियाणा में लाडो लक्ष्मी, राजस्थान में मुफ्त बिजली और पंजाब में मुफ्त पानी जैसी योजनाएं इसका उदाहरण हैं। लगभग हर चुनाव के साथ कोई न कोई नई योजना जुड़ जाती है। पहली नजर में ये योजनाएं गरीबों के लिए राहत का माध्यम दिखाई देती हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में इनके लिए स्थायी वित्तीय स्रोत तय नहीं किए गए हैं। न राजस्व बढ़ाने की ठोस तैयारी होती है और न ही अनावश्यक खर्च कम करने की। परिणाम यह है कि कई राज्य अपनी आय का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज और उसके ब्याज के भुगतान में खर्च कर रहे हैं। ऐसे में सड़क, स्कूल, अस्पताल और अन्य बुनियादी विकास कार्यों के लिए संसाधन सीमित होते जा रहे हैं।
आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में इस स्थिति को गंभीर वित्तीय जोखिम बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, कई राज्यों का कर्ज उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के निर्धारित स्तर से काफी ऊपर पहुंचने की आशंका है। पंजाब, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और केरल जैसे राज्यों की स्थिति पहले से ही चिंता का विषय बनी हुई है। कई राज्यों में कर्मचारियों के वेतन और नियमित खर्च के बाद विकास कार्यों के लिए पर्याप्त धन नहीं बचता। इसके बावजूद चुनावी मौसम आते ही नई मुफ्त योजनाओं की घोषणाएं शुरू हो जाती हैं। यह भूल जाना आसान है कि सरकारी धन किसी पेड़ पर नहीं उगता, बल्कि करदाताओं के पैसे से आता है। जब यही धन बिना दीर्घकालिक योजना के खर्च होता है, तो विकास की गति प्रभावित होना स्वाभाविक है।
सबसे गंभीर पक्ष यह है कि मुफ्त सुविधाओं की राजनीति अब जन अपेक्षाओं का हिस्सा बनती जा रही है। मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त बस यात्रा, मुफ्त शिक्षा और मुफ्त इलाज जैसी घोषणाएं लोकप्रिय जरूर लगती हैं, लेकिन इनके लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों पर पर्याप्त चर्चा नहीं होती। बिजली वितरण कंपनियां पहले से घाटे में हैं, फिर भी मुफ्त बिजली देने का बोझ उन्हीं पर डाला जाता है। बाद में सरकारों को उन्हें बचाने के लिए अतिरिक्त कर्ज लेना पड़ता है। यही स्थिति अन्य क्षेत्रों में भी दिखाई देती है। आज राहत के नाम पर लिया गया कर्ज भविष्य में ब्याज के रूप में अगली पीढ़ियों पर बोझ बनकर लौटता है।
इस स्थिति के लिए चुनावी राजनीति भी कम जिम्मेदार नहीं है। चुनावों के दौरान विभिन्न दल एक-दूसरे से बढ़कर घोषणाएं करते हैं। यदि किसी राज्य में कोई योजना लागू होती है, तो दूसरे राज्य में भी वैसी या उससे बड़ी योजना की मांग उठने लगती है। कई बार यह विचार पीछे छूट जाता है कि सरकारी खजाना इसकी अनुमति देता भी है या नहीं। आरबीआई ने भी संकेत दिया है कि लोकलुभावन घोषणाओं के साथ वित्तीय अनुशासन को प्राथमिकता देना आवश्यक है, अन्यथा इसका दीर्घकालिक असर विकास पर पड़ेगा।
समाधान मुफ्त योजनाओं को पूरी तरह समाप्त करना नहीं है। जरूरतमंदों को सहायता मिलनी ही चाहिए, लेकिन सहायता लक्षित और वित्तीय रूप से टिकाऊ होनी चाहिए। पहला कदम यह होना चाहिए कि योजनाओं का लाभ केवल वास्तविक पात्रों तक सीमित रहे। दूसरा, राज्यों को अपने राजस्व स्रोत मजबूत करने होंगे। तीसरा, केंद्र और राज्यों को मिलकर ऐसी वित्तीय अनुशासन व्यवस्था विकसित करनी चाहिए, जिसके तहत किसी भी नई योजना की घोषणा से पहले उसके खर्च और वित्तीय स्रोत का स्पष्ट आकलन अनिवार्य हो। जनता को भी यह समझना होगा कि अल्पकालिक लाभ और दीर्घकालिक विकास के बीच संतुलन जरूरी है। आरबीआई की यह रिपोर्ट समय रहते चेतने का अवसर है। यदि वित्तीय अनुशासन और विकास के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो बढ़ता कर्ज आने वाली पीढ़ियों के लिए भारी आर्थिक बोझ बन सकता है।










