नई दिल्ली, 24 जुलाई।
आज के दौर में नींद सबसे अधिक उपेक्षित होती जा रही है। देर रात तक जागना, अनियमित समय पर सोना और सुबह जल्दी उठकर काम पर निकल जाना अब सामान्य दिनचर्या बन चुकी है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अधूरी नींद केवल थकान और चिड़चिड़ापन ही नहीं लाती, बल्कि धीरे-धीरे मस्तिष्क को भी नुकसान पहुंचाती है। ताजा शोध और विशेषज्ञों के अनुसार, अपर्याप्त नींद और असंतुलित जीवनशैली के कारण डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी अब युवाओं में भी तेजी से देखने को मिल रही है। पहले इसे केवल बढ़ती उम्र की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब 15 से 30 वर्ष आयु वर्ग में भी भूलने की समस्या के मामले सामने आ रहे हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और न्यूरोलॉजी विशेषज्ञों के अनुसार, नींद के दौरान मस्तिष्क स्वयं को साफ करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है। इसे मस्तिष्क का प्राकृतिक क्लीनअप सिस्टम माना जाता है। जब व्यक्ति प्रतिदिन छह से आठ घंटे की गहरी नींद लेता है, तब मस्तिष्क बीटा-एमिलॉयड और टाउ प्रोटीन जैसे हानिकारक तत्वों को बाहर निकालने का काम करता है। यही प्रोटीन अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी बीमारियों से जुड़े माने जाते हैं। यदि नींद पूरी नहीं होती, तो यह सफाई प्रक्रिया बाधित हो जाती है और ये तत्व मस्तिष्क में जमा होने लगते हैं। समय के साथ इससे याददाश्त कमजोर पड़ने लगती है, एकाग्रता घटती है और भूलने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत में डिमेंशिया के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह समस्या अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही। कॉलेज के विद्यार्थी, आईटी क्षेत्र के कर्मचारी और युवा उद्यमी भी इसकी चपेट में आने लगे हैं। देर रात तक स्क्रीन के सामने बैठना, अत्यधिक कार्यभार और नींद को महत्व न देना युवाओं के मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि जो लोग नियमित रूप से छह घंटे से कम सोते हैं, उनमें कम उम्र में ही याददाश्त संबंधी समस्याएं विकसित होने का जोखिम बढ़ जाता है।
अधूरी नींद के संकेतों को समय रहते पहचानना बेहद जरूरी है। यदि बार-बार एक ही बात भूल जाना, छोटी-छोटी बातों पर ध्यान केंद्रित न कर पाना, काम करते समय चीजें भूल जाना या रात में बार-बार नींद टूटना जैसी समस्याएं लगातार बनी रहें, तो इन्हें सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई युवा ऐसी स्थिति में कॉफी, एनर्जी ड्रिंक या अन्य तात्कालिक उपायों का सहारा लेते हैं, लेकिन इससे समस्या का समाधान नहीं होता। न्यूरोलॉजिस्ट मानते हैं कि समय पर ध्यान न देने पर यह स्थिति आगे चलकर गंभीर रूप ले सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, डिमेंशिया का खतरा केवल नींद की कमी से ही नहीं, बल्कि पूरी जीवनशैली से जुड़ा हुआ है। लगातार तनाव, वायु प्रदूषण और असंतुलित खानपान भी मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं। शहरों में रहने वाले लोगों पर प्रदूषण का असर अधिक देखा जा रहा है। पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म कण श्वास के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर मस्तिष्क तक पहुंच सकते हैं, जिससे सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है। इसके अलावा फास्ट फूड और अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन मस्तिष्क को आवश्यक पोषक तत्व नहीं दे पाते, जिससे उसकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
डिमेंशिया से बचाव के लिए विशेषज्ञ तीन बातों पर सबसे अधिक जोर देते हैं। पहली, प्रतिदिन सात से आठ घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद लेना और सोने-जागने का नियमित समय बनाए रखना। दूसरी, नियमित व्यायाम और संतुलित आहार अपनाना। सप्ताह में कम से कम पांच दिन 30 मिनट तक टहलना, योग करना तथा हरी सब्जियां, फल और सूखे मेवे भोजन में शामिल करना मस्तिष्क के लिए लाभकारी माना जाता है। तीसरी, मानसिक सक्रियता बनाए रखना। पुस्तकें पढ़ना, नई भाषा सीखना, पहेलियां हल करना और सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना मस्तिष्क को सक्रिय रखने में मदद करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मस्तिष्क भी शरीर की अन्य मांसपेशियों की तरह है, जितना उसका उपयोग होगा, वह उतना ही सक्रिय रहेगा।
भूलने की आदत को सामान्य मानने की गलती अब नहीं की जानी चाहिए। पहले यह माना जाता था कि बढ़ती उम्र के साथ याददाश्त कमजोर होना स्वाभाविक है, लेकिन अब कम उम्र के युवा भी छोटी-छोटी बातें भूलने लगे हैं। इसे केवल व्यस्तता या लापरवाही समझकर टालना उचित नहीं है, क्योंकि यही शुरुआती संकेत भविष्य में गंभीर समस्या का रूप ले सकते हैं। समय पर जांच और उचित उपचार से कई मामलों में स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है।
सरकार और स्वास्थ्य संस्थाएं भी अब इस विषय पर जागरूकता बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं। स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों पर स्लीप हाइजीन तथा मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। कंपनियों को भी कर्मचारियों के लिए संतुलित कार्य समय और बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस सुनिश्चित करने की सलाह दी जा रही है, क्योंकि लगातार तनाव और ओवरटाइम न केवल कार्यक्षमता घटाते हैं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
सफलता की दौड़ में नींद की अनदेखी सबसे महंगी भूल साबित हो सकती है। देर रात तक काम करने से मिलने वाली उपलब्धियां अस्थायी हो सकती हैं, लेकिन अधूरी नींद से मस्तिष्क को होने वाला नुकसान लंबे समय तक साथ रहता है। स्वस्थ मस्तिष्क ही स्वस्थ जीवन और उज्ज्वल भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी है। इसलिए समय पर सोना, पर्याप्त नींद लेना और संतुलित जीवनशैली अपनाना केवल अच्छी आदत नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है।















