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संपादकीय
27 Jul, 2026

आमों का बादशाह: उत्पादन में नंबर वन, निर्यात में फिसड्डी

भारत दुनिया में सबसे अधिक आम उत्पादन करने वाला देश होने के बावजूद निर्यात, कोल्ड चेन, गुणवत्ता मानकों और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की चुनौतियों से जूझ रहा है।

नई दिल्ली, 27 जुलाई।

भारत को आमों का देश कहा जाता है और इस बात पर दुनिया भी सहमत है, क्योंकि दुनिया में जितना आम पैदा होता है, उसका लगभग 43 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत की धरती से आता है। वर्ष 2024-25 में देश में आम का कुल उत्पादन 228.37 लाख टन अनुमानित किया गया है, जो किसी भी अन्य देश से कई गुना अधिक है। देश में 1500 से ज्यादा किस्में पाई जाती हैं। दशहरी, लंगड़ा, अल्फांसो, केसर, चौसा, हिमसागर, बम्बई ग्रीन और तोतापरी जैसी किस्मों का स्वाद विदेशों तक मशहूर है। फिर भी एक कड़वा सच यह है कि उत्पादन में बादशाह होने के बावजूद निर्यात के मामले में भारत बहुत पीछे है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने केवल 29,938 टन आम निर्यात किया, जो कुल उत्पादन का मात्र 0.13 प्रतिशत है। यानी 99 प्रतिशत से अधिक आम देश के भीतर ही खप जाता है। मैक्सिको, थाईलैंड, वियतनाम और पाकिस्तान जैसे देश उत्पादन में हमसे काफी छोटे हैं, लेकिन निर्यात में आगे निकल चुके हैं।

इसका सबसे बड़ा कारण आम की प्रकृति है। आम अत्यंत नाजुक फल है। कटाई के चार से पांच दिन के भीतर यदि उसे उचित तापमान और नमी नहीं मिले तो वह खराब होने लगता है। भारत में गांव स्तर तक कोल्ड चेन और पैक हाउस की सुविधाएं अभी पर्याप्त नहीं पहुंच पाई हैं। परिणामस्वरूप खेत से मंडी तक पहुंचने के दौरान ही बड़ी मात्रा में आम खराब हो जाता है। दूसरी बड़ी चुनौती अंतरराष्ट्रीय मानकों की है। अमेरिका, यूरोपीय संघ, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे बड़े बाजारों में आम भेजने के लिए कीटनाशकों की सीमा, हॉट वाटर ट्रीटमेंट और पैकेजिंग के कड़े नियम हैं। छोटे किसान सीमित संसाधनों और तकनीक के अभाव में इन मानकों को पूरा नहीं कर पाते।

भारत में आम की खेती का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। मुगल काल में भी आम को शाही फल का दर्जा प्राप्त था। आज उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। लाखों किसानों की आजीविका आम की खेती पर निर्भर है। एक अच्छी फसल पूरे वर्ष की आय सुनिश्चित कर देती है। लेकिन घरेलू मांग इतनी अधिक है कि अधिकांश उत्पादन देश के भीतर ही खप जाता है। 140 करोड़ की आबादी वाले देश में गर्मियों के मौसम में आम की खपत स्वाभाविक रूप से बहुत अधिक रहती है। व्यापारी पहले घरेलू बाजार की जरूरत पूरी करते हैं और उसके बाद जो बचता है, वही निर्यात के लिए जाता है।

निर्यात कम होने का एक अन्य कारण लागत भी है। घरेलू बाजार में आम की कीमत 30 से 40 रुपये प्रति किलो रहती है, लेकिन शिपिंग, टैक्स और हैंडलिंग जोड़ने के बाद इसकी कीमत काफी बढ़ जाती है। इसके विपरीत थाईलैंड और मैक्सिको ने अपनी सप्लाई चेन इतनी मजबूत कर ली है कि वे कम लागत में उच्च गुणवत्ता वाला आम वैश्विक बाजार तक पहुंचा देते हैं। भारत में अभी भी अधिकांश खेती पारंपरिक तरीके से होती है। ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और आधुनिक रोग नियंत्रण तकनीकों का सीमित उपयोग होने से गुणवत्ता में एकरूपता नहीं आ पाती।

सरकार ने इस दिशा में कई कदम उठाए हैं। एपीडा के माध्यम से किसानों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। पैक हाउस और कोल्ड स्टोरेज के लिए सब्सिडी दी जा रही है तथा निर्यातकों को वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है। कई राज्यों में क्लस्टर आधारित खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। महाराष्ट्र के अल्फांसो, उत्तर प्रदेश के दशहरी और बिहार के जर्दालू को जीआई टैग भी मिल चुका है, जिससे उनकी वैश्विक पहचान मजबूत हुई है। हालांकि ये प्रयास अभी व्यापक स्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं।

भारत के सामने निर्यात बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं। मध्य पूर्व, यूरोप और अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों के बीच भारतीय आम की भारी मांग है। दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका में भी नए बाजार विकसित किए जा सकते हैं। यदि गुणवत्ता और समय पर आपूर्ति सुनिश्चित की जाए तो निर्यात कई गुना बढ़ सकता है। इसके लिए गांव स्तर तक कोल्ड चेन का विस्तार, आधुनिक पैक हाउस की स्थापना और किसानों को निर्यात मानकों के प्रति जागरूक बनाना आवश्यक है।

निर्यात बढ़ने से किसानों की आय में भी सीधा इजाफा होगा। अतिरिक्त उत्पादन विदेशी बाजारों में जाएगा तो घरेलू बाजार में कीमतों का अत्यधिक उतार-चढ़ाव भी कम होगा। इसके साथ ही आम से जूस, पल्प, जैम और अन्य प्रसंस्कृत उत्पादों का निर्यात बढ़ाकर किसानों को सालभर आय का स्रोत उपलब्ध कराया जा सकता है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

आम केवल एक फल नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति और पहचान का हिस्सा है। साहित्य, लोकजीवन और परंपराओं में इसका विशेष स्थान रहा है। उत्पादन में हम दुनिया के निर्विवाद बादशाह हैं, लेकिन वैश्विक बाजार में अभी भी अपनी क्षमता के अनुरूप स्थान नहीं बना सके हैं। अब समय आ गया है कि सरकार, उद्योग और किसान मिलकर दीर्घकालिक रणनीति बनाएं, ब्रांडिंग पर निवेश करें और भारतीय आम को विश्व बाजार में मजबूत पहचान दिलाएं। जिस दिन अल्फांसो, दशहरी और केसर वैश्विक ब्रांड बन जाएंगे, उस दिन भारत केवल उत्पादन में ही नहीं, बल्कि निर्यात में भी आमों का सच्चा बादशाह कहलाएगा।

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