नई दिल्ली, 27 जुलाई।
मातृत्व और परिवार के मूल्यों पर गहन चिंतन, युगानुकूल मातृत्व और हमारी सामाजिक व्यवस्था पर चर्चा हुई। इसमें देशभर से आई महिलाओं ने अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में अपने विचार व्यक्त किए। इसका उद्देश्य बदलते सामाजिक परिवेश में भारतीय परिवार और मातृत्व की भूमिका पर नए सिरे से विचार करना था। कार्यक्रम का आयोजन विश्वमंगल सभा द्वारा उत्तर भारत के राष्ट्रीय प्रबोधन के अंतर्गत 23 और 24 जुलाई को किया गया, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से लगभग 900 से अधिक प्रबुद्ध मातृशक्ति उपस्थित रही।
मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि परिवार में समय देना और संवाद बनाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। बच्चों की आवश्यकता है कि माता-पिता उन्हें समय दें, उनकी बात सुनें और उनके साथ बैठें। आज के तेज रफ्तार जीवन में, जब माता-पिता दोनों काम में व्यस्त हैं, तब बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना और भी जरूरी हो गया है। उन्होंने कहा कि बच्चे अनुकरण से सीखते हैं, इसलिए माता-पिता को स्वयं आदर्श आचरण प्रस्तुत करना चाहिए।
डॉ. भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चे उपदेश से अधिक आचरण से सीखते हैं। इसलिए घर का माहौल ऐसा होना चाहिए, जहां प्रेम, सम्मान और अनुशासन तीनों हों। उन्होंने कहा कि माता-पिता का ज्ञान भी निरंतर बढ़ना आवश्यक है, ताकि वे बच्चों को सही दिशा दे सकें। आज के समय में जानकारी बहुत है, लेकिन संस्कारों की कमी दिखाई दे रही है। इसलिए माता-पिता को स्वयं सीखना होगा और फिर बच्चों को सिखाना होगा।
मातृत्व केवल जन्म देने का नाम नहीं है। मातृत्व एक साधना और जिम्मेदारी है, जो समाज की नींव बनाती है। जब माँ सशक्त होती है तो पूरा परिवार सशक्त होता है और जब परिवार सशक्त होता है तो समाज और राष्ट्र मजबूत बनते हैं। इसलिए माताओं को शिक्षित करना, आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें मानसिक सहयोग देना आज के समय की मांग है।
तकनीक और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव से बच्चों और माता-पिता के बीच दूरी बढ़ रही है। पहले घर में एक साथ बैठकर बातचीत होती थी, कहानियां सुनाई जाती थीं, लेकिन अब हर कोई अपने मोबाइल में व्यस्त है। इससे रिश्ते कमजोर हो रहे हैं। इसलिए परिवार के लिए समय निकालना जरूरी है। साथ में भोजन करना, घूमना और त्योहार मनाना जैसी छोटी-छोटी बातें बड़े बदलाव ला सकती हैं।
भारतीय संस्कृति में मातृत्व को हमेशा सर्वोच्च स्थान मिला है। माँ को पहली गुरु माना गया है। लेकिन आज की पीढ़ी पर पश्चिमी जीवनशैली का प्रभाव बढ़ने से परिवार की संरचना बदल रही है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और एकल परिवार बढ़ रहे हैं। ऐसे में माताओं की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। उन्हें घर और बाहर, दोनों जगह संतुलन बनाना पड़ता है। इसलिए समाज को भी माताओं का सम्मान करना चाहिए और उनके योगदान को उचित महत्व देना चाहिए।
कार्यक्रम में महिलाओं ने अपने अनुभव भी साझा किए। कई महिलाओं ने बताया कि उन्होंने नौकरी और परिवार दोनों की जिम्मेदारियां निभाते हुए बच्चों को अच्छे संस्कार दिए। कुछ ने कहा कि बच्चों को मोबाइल से दूर रखने के लिए उन्होंने स्वयं मोबाइल का उपयोग कम करना शुरू किया। कुछ ने घर में सप्ताह में एक दिन 'नो स्क्रीन डे' रखा, जिसमें पूरा परिवार साथ समय बिताता है। इन अनुभवों ने अन्य महिलाओं को भी प्रेरित किया।
इस तरह की बैठकों का उद्देश्य केवल चर्चा करना नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर सकारात्मक बदलाव लाना है। अगले चरण में विभिन्न राज्यों में मातृशक्ति सम्मेलन आयोजित किए जाएंगे, जहां स्थानीय स्तर पर महिलाओं को जोड़कर परिवार और समाज निर्माण के लिए प्रशिक्षण दिया जाएगा। साथ ही स्कूलों और कॉलेजों में भी मातृत्व और परिवार के महत्व पर कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी।
राष्ट्र निर्माण ईंट और पत्थरों से नहीं, बल्कि संस्कारों से होता है। संस्कारों की पहली पाठशाला घर है और घर की पहली शिक्षिका माँ है। यदि हमें एक मजबूत और चरित्रवान भारत बनाना है तो मातृत्व को सम्मान देना होगा, परिवार को समय देना होगा और बच्चों के साथ संवाद की परंपरा को फिर से जीवित करना होगा। समस्याएं चाहे कितनी भी बड़ी हों, उनका समाधान परिवार से ही शुरू होता है और परिवार की धुरी मातृत्व है। यदि मातृत्व को समयानुकूल नई ऊर्जा और समझ के साथ सशक्त किया जाए तो आने वाली पीढ़ी केवल सफल ही नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक भी बनेगी।

















