रियाद, 27 जुलाई।
अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुआ 30 वर्षीय असैन्य परमाणु सहयोग समझौता कागज पर तो ऊर्जा और विकास की साझेदारी लगता है, लेकिन इसकी गूंज पूरे पश्चिम एशिया और उससे आगे तक सुनाई दे रही है। यह समझौता केवल दो देशों के बीच बिजली बनाने का सौदा नहीं है। यह एक रणनीतिक दांव, एक भू-राजनीतिक संदेश और ऐसे क्षेत्र में नए शक्ति संतुलन की शुरुआत है, जो पहले से ही तनाव, युद्ध और गठबंधनों के जटिल जाल में उलझा हुआ है। रियाद की चमकती इमारतों और वाशिंगटन के सत्ता गलियारों में लिए गए इस फैसले के असर आने वाले दशकों तक महसूस किए जाएंगे।
समझौते की रूपरेखा सीधी दिखाई देती है। अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में भाग लेंगी। रियाद को अपने नागरिक परमाणु संयंत्रों के लिए ईंधन और तकनीक मिलेगी और बदले में अमेरिका को खाड़ी क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखने का एक नया जरिया मिलेगा। इसके साथ द्विपक्षीय सुरक्षा प्रावधान भी जुड़े हैं, जिन्हें आमतौर पर सेफगार्ड कहा जाता है। इसका मतलब है कि परमाणु सामग्री का दुरुपयोग न हो, इसके लिए निगरानी और जांच की व्यवस्था होगी। लेकिन पूरा मसौदा अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है, इसलिए विशेषज्ञ और विश्लेषक केवल अनुमान और लीक हुई जानकारियों के आधार पर ही इसके मायने निकाल रहे हैं। सबसे संवेदनशील बिंदु यूरेनियम संवर्धन का है। रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब चाहता है कि उसे अपने यहां यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिले, ताकि वह अपने परमाणु रिएक्टरों के लिए ईंधन खुद तैयार कर सके। यह मांग तकनीकी रूप से जायज लगती है, क्योंकि इससे लागत कम होगी और आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, लेकिन यही बिंदु सबसे खतरनाक भी है।
यूरेनियम संवर्धन एक ऐसी तकनीक है, जिसकी दोहरी प्रकृति है। एक तरफ इससे परमाणु बिजलीघरों के लिए ईंधन बनता है और दूसरी तरफ इसी तकनीक को थोड़ा और आगे बढ़ाकर हथियार-ग्रेड का यूरेनियम भी बनाया जा सकता है। दुनिया में बहुत कम देश हैं, जिन्हें यह अनुमति मिली है और हर बार यह अनुमति बहुत कड़ी शर्तों के साथ दी गई है। इसलिए वाशिंगटन में भी इस मुद्दे पर बहस तेज है। अमेरिकी कांग्रेस को इस समझौते को अंतिम मंजूरी देनी है और वहां के सांसद पूछ रहे हैं कि क्या हम एक ऐसे देश को संवर्धन की क्षमता दे रहे हैं, जो कल को हथियार बना सकता है। अगर सुरक्षा प्रावधान कमजोर रहे तो यह समझौता ऊर्जा से निकलकर हथियारों की दौड़ में बदल सकता है।
पश्चिम एशिया पहले से ही बारूद के ढेर पर बैठा है। एक तरफ ईरान का परमाणु कार्यक्रम दशकों से विवाद का कारण बना हुआ है। तेहरान और वाशिंगटन के बीच अविश्वास इतना गहरा है कि कोई भी नई पहल सीधे उससे जोड़कर देखी जाती है। दूसरी तरफ इजरायल, सऊदी अरब, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश अपनी सुरक्षा को लेकर हमेशा चिंतित रहते हैं। ऐसे माहौल में अगर सऊदी अरब को संवर्धन की क्षमता मिलती है तो बाकी देश भी यही मांग करेंगे। संयुक्त अरब अमीरात पहले ही कह चुका है कि उसने बिना संवर्धन के समझौता किया था और उसे घाटा हुआ। अब वह भी दोबारा बात करेगा। तुर्की, मिस्र और अन्य देश भी लाइन में लग जाएंगे। नतीजा यह होगा कि पूरा क्षेत्र एक नई हथियारों की दौड़ में प्रवेश करेगा, जहां हर देश अपने परमाणु कार्यक्रम को ताकत का प्रतीक मानेगा।
इस समझौते को केवल परमाणु चश्मे से देखना गलती होगी। इसके पीछे तेल के बाद की दुनिया की तैयारी भी है। सऊदी अरब जानता है कि तेल हमेशा के लिए नहीं रहेगा। विजन 2030 के तहत वह अपनी अर्थव्यवस्था को विविध बनाना चाहता है। परमाणु ऊर्जा उसके लिए एक विकल्प है, क्योंकि इससे बड़ी आबादी को बिजली मिलेगी, उद्योग चलेंगे और पानी को साफ करने के लिए डिसेलिनेशन प्लांट भी चलाए जा सकेंगे। अमेरिका के लिए यह अवसर है कि वह चीन और रूस को इस क्षेत्र से दूर रखे। पिछले कुछ वर्षों में बीजिंग और मॉस्को दोनों ने सऊदी अरब को परमाणु तकनीक देने की पेशकश की है। अगर अमेरिका पीछे हटता है तो रियाद दूसरे दरवाजे खटखटाएगा। इसलिए यह सौदा ऊर्जा से ज्यादा प्रभाव और गठबंधन का सौदा है।
लेकिन इतिहास हमें चेतावनी देता है। परमाणु तकनीक जब एक बार दी जाती है तो उसे वापस लेना बहुत मुश्किल होता है। भारत और अमेरिका का 123 समझौता इसका उदाहरण है। उस समझौते के बाद भारत को नागरिक परमाणु व्यापार का रास्ता मिला, लेकिन उसके साथ कड़ी निगरानी और अलगाव भी आया। सऊदी अरब के मामले में सवाल यह है कि क्या वाशिंगटन उतनी कड़ी शर्तें लगा पाएगा, जितनी भारत के मामले में लगाई थीं, या फिर तेल और रणनीतिक जरूरतों के कारण समझौता ढीला रहेगा। अगर शर्तें ढीली हुईं तो यह संदेश जाएगा कि नियम सबके लिए बराबर नहीं हैं और इससे परमाणु अप्रसार व्यवस्था की साख को धक्का लगेगा।
आम आदमी के लिए इसका क्या मतलब है? सबसे पहले तो यह कि पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ सकती है। जहां पहले से ही यमन, सीरिया और इजरायल-फिलिस्तीन जैसे मुद्दे सुलग रहे हैं, वहां एक नई हथियारों की दौड़ आग में घी डालने का काम करेगी। दूसरा, तेल की कीमतें प्रभावित हो सकती हैं, क्योंकि निवेशक अनिश्चितता से डरते हैं और कोई भी संघर्ष सीधे वैश्विक बाजार को हिला देता है। तीसरा, भारत जैसे देशों के लिए यह एक कूटनीतिक चुनौती है। भारत के अमेरिका और सऊदी अरब, दोनों से गहरे संबंध हैं। नई दिल्ली को यह देखना होगा कि क्षेत्रीय संतुलन न बिगड़े और उसकी ऊर्जा सुरक्षा पर असर न पड़े।
समझौते के समर्थकों का कहना है कि यह समझौता जरूरी है, क्योंकि सऊदी अरब को विकास का अधिकार है और उसे कार्बन-मुक्त ऊर्जा चाहिए। परमाणु ऊर्जा जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में मदद करेगी और क्षेत्र में स्थिरता लाएगी। उनका कहना है कि सेफगार्ड और अंतरराष्ट्रीय निगरानी के साथ यह पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। लेकिन आलोचक पूछते हैं कि क्या कागज पर लिखे वादे जमीनी हकीकत में बदलेंगे? क्या निगरानी इतनी मजबूत होगी कि किसी भी गड़बड़ी को तुरंत पकड़ा जा सके? और क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति इतनी बनी रहेगी कि समझौते का उल्लंघन होने पर सख्त कार्रवाई हो?
यह समझौता एक कसौटी है। यह कसौटी अमेरिका की है कि वह अपने सहयोगी को कितना भरोसा देता है और कितनी सीमा तय करता है। यह कसौटी सऊदी अरब की है कि वह विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाता है। और यह कसौटी पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की है कि वह परमाणु युग में नियमों को कितना पवित्र मानता है।
पश्चिम एशिया का भविष्य अब इस बात पर टिका है कि यह 30 साल का समझौता बिजली का उजाला लाएगा या अंधेरे की आशंका। रेगिस्तान की रेत में अब केवल तेल के कुएं नहीं, बल्कि परमाणु रिएक्टरों की छाया भी दिखाई दे रही है और उस छाया में दुनिया को बहुत सावधानी से कदम रखना होगा, क्योंकि एक गलत कदम पूरे क्षेत्र का नक्शा बदल सकता है।

















