नई दिल्ली, 28 जुलाई।
आज घर की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि जो हाथ बच्चों को थामने के लिए बने थे, वही हाथ अब मोबाइल थामे हुए हैं। जो आंखें बच्चों की छोटी-छोटी खुशियां देखने के लिए बनी थीं, वही स्क्रीन पर अटकी हैं। नतीजा हमारे सामने है। अमेरिका के 600 किशोरों पर हुए अध्ययन से लेकर भारत के हर मोहल्ले तक एक ही कहानी दोहराई जा रही है। माता-पिता मोबाइल में व्यस्त हैं और बच्चे असुरक्षा, अकेलेपन और उपेक्षा के बीच बड़े हो रहे हैं।
फ्रंटियर्स इन साइकोलॉजी जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में 12 से 17 वर्ष के किशोरों ने कहा कि जब वे मम्मी-पापा से बात करना चाहते हैं, तब वे फोन में व्यस्त रहते हैं। इससे उन्हें लगता है कि उनकी बातें महत्वपूर्ण नहीं हैं। कई बच्चों ने खुद को नज़रअंदाज़, अकेला और महत्वहीन महसूस करने की बात कही। अध्ययन का शीर्षक था—"मम्मी, क्या आपको मुझसे ज़्यादा आपका फोन पसंद है?" यह सवाल जितना छोटा है, उतना ही गहरा संदेश देता है।
यह समस्या केवल किशोरावस्था तक सीमित नहीं है। एक साल का बच्चा जब गिरकर मां की ओर देखता है और मां रील देखने में व्यस्त होती है, तो उसके मन में अकेलेपन का भाव जन्म लेता है। तीन साल का बच्चा जब अपनी ड्राइंग दिखाने दौड़ता है और पिता व्हाट्सऐप में व्यस्त होते हैं, तो उसे लगता है कि उसकी खुशी की कोई कीमत नहीं है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार ऐसे अनुभव बार-बार होने पर बच्चे के भीतर असुरक्षित लगाव विकसित होता है, जिसका असर आगे चलकर रिश्तों, आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।
भारत में स्थिति और गंभीर है। लंबे ऑफिस घंटे, वर्क फ्रॉम होम और चौबीसों घंटे आने वाले नोटिफिकेशन ने घर के भीतर भी दूरी बढ़ा दी है। बच्चा स्कूल से लौटकर दिनभर की बातें सुनाना चाहता है, लेकिन मां मीटिंग में और पिता ग्रुप चैट में व्यस्त हैं। धीरे-धीरे वह चुप हो जाता है और यूट्यूब, कार्टून तथा गेम्स में अपना साथी ढूंढ़ने लगता है। 2023 में चीन के एक अध्ययन में भी पाया गया कि जिन माता-पिता को मोबाइल की लत होती है, उनके बच्चों में भी स्क्रीन की लत लगने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हमें लगता है कि हम बच्चों के भविष्य के लिए मेहनत कर रहे हैं, लेकिन बच्चा बड़ा होकर महंगे खिलौने नहीं, बल्कि वे पल याद रखेगा जब उसकी ओर देखने के बजाय माता-पिता स्क्रीन पर नजरें गड़ाए बैठे थे। शोधकर्ता डॉन ग्रांट ने सही कहा है कि समस्या मोबाइल नहीं, बल्कि उसका गलत समय पर उपयोग है।
समाधान कठिन नहीं है। घर में डाइनिंग टेबल, बेडरूम और बच्चों के पढ़ाई के कमरे को नो-फोन ज़ोन बनाया जाए। रोज़ कम से कम एक घंटा ऐसा हो, जब पूरा परिवार बिना किसी स्क्रीन के साथ बैठे। बच्चा जब बात करे, तो उसकी आंखों में देखकर उसे पूरा ध्यान दें। बच्चे वही सीखते हैं, जो अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं।
सरकार, स्कूल और समाज को भी इस दिशा में पहल करनी होगी। स्कूलों में पैरेंटिंग कार्यशालाएं हों, कंपनियां कर्मचारियों को परिवार के लिए समय देने में लचीलापन दें और मीडिया रिश्तों की अहमियत पर भी उतना ही ज़ोर दे।
तकनीक ने हमें दुनिया से जोड़ा है, लेकिन अपने ही घर से दूर भी किया है। यदि आज यह दूरी नहीं मिटाई गई, तो अगली पीढ़ी रिश्तों से अधिक स्क्रीन को महत्व देगी। बचपन लौटकर नहीं आता। इसलिए आज ही फोन एक तरफ रखिए और अपने बच्चे से पूछिए—"बेटा, आज तुम्हारे दिन की सबसे अच्छी बात क्या थी?" यही कुछ पल उसके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी बन सकते हैं। यह संस्करण लगभग 500 शब्दों का है, भाषा समाचार-पत्र के संपादकीय के अनुरूप प्रूफरीड और संक्षिप्त की गई है।
















