भोपाल, 28 जुलाई।
मध्यप्रदेश में पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में पीड़ित बच्चों को न्यायिक प्रक्रिया के दौरान बेहतर संस्थागत सहयोग उपलब्ध कराने के उद्देश्य से मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) लागू कर दी गई है। नई व्यवस्था के तहत प्रत्येक पॉक्सो प्रकरण में पुलिस को प्राथमिकी दर्ज होने के 24 घंटे के भीतर संबंधित बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) को सूचना देना अनिवार्य होगा। साथ ही पात्र मामलों में सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति भी सुनिश्चित की जाएगी।
राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की पहल पर तैयार इस एसओपी के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए मध्यप्रदेश पुलिस मुख्यालय ने सभी पुलिस आयुक्तों, जिला पुलिस अधीक्षकों और विशेष किशोर पुलिस इकाइयों को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं, ताकि नई व्यवस्था का समयबद्ध पालन सुनिश्चित किया जा सके।
एसओपी के अनुसार पॉक्सो अधिनियम, 2012 और पॉक्सो नियम, 2020 के तहत सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति कानूनी दायित्व है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि प्रत्येक पात्र मामले में बाल कल्याण समिति द्वारा सपोर्ट पर्सन नियुक्त किया जाएगा। यदि किसी प्रकरण में नियुक्ति नहीं की जाती है तो उसके कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना अनिवार्य रहेगा।
नई व्यवस्था के तहत प्राथमिकी दर्ज होने के 24 घंटे के भीतर पुलिस को पीड़ित बच्चे और मामले से जुड़ी आवश्यक जानकारी बाल कल्याण समिति को उपलब्ध करानी होगी। इसके बाद समिति मामले की समीक्षा करेगी और आवश्यकता के अनुसार सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति का निर्णय लेगी।
एसओपी में सपोर्ट पर्सन की जिम्मेदारियां भी तय की गई हैं। वह न्यायिक प्रक्रिया के दौरान पीड़ित बच्चे और उसके परिवार के साथ लगातार संपर्क बनाए रखेगा। इसके अलावा मनोसामाजिक परामर्श, कानूनी सहायता उपलब्ध कराने, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण तथा जिला बाल संरक्षण इकाई के साथ समन्वय स्थापित करने और पुनर्वास प्रक्रिया में सहयोग देने की भूमिका निभाएगा।
पुलिस मुख्यालय ने निर्देश दिए हैं कि एसओपी में पुलिस से संबंधित सभी दायित्वों का निर्धारित समय-सीमा के भीतर पालन किया जाए। इसके लिए केस डायरी में बाल कल्याण समिति को सूचना भेजने, सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति और उससे जुड़ी समस्त कार्रवाई का विवरण दर्ज किया जाएगा। साथ ही जिला पुलिस अधीक्षक स्तर पर इन मामलों की नियमित समीक्षा भी की जाएगी।
आयोग के अनुसार नई व्यवस्था में पुलिस, बाल कल्याण समिति, जिला बाल संरक्षण इकाई, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और सपोर्ट पर्सन समन्वित रूप से कार्य करेंगे। इससे जांच प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील बनाने के साथ-साथ पीड़ित बच्चों के अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायता मिलेगी

















