वाशिंगटन, 4 अगस्त।
अमेरिका के 25 राज्यों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति को चुनौती देते हुए यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर किया है। ये सभी राज्य डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाले हैं।
न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिटिया जेम्स ने कहा कि ट्रंप प्रशासन अवैध तरीके से परिवारों और कारोबारों पर अतिरिक्त कर का बोझ डाल रहा है। दूसरी ओर, ट्रंप का कहना है कि ऊंचे टैरिफ से अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र को मजबूती मिलेगी। उन्होंने इसके लिए वर्ष 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट का हवाला देते हुए व्यापार घाटे को राष्ट्रीय आपातकाल बताया था और लगभग सभी देशों से आयात पर टैरिफ लागू किया।
राज्यों का आरोप है कि नई टैरिफ व्यवस्था फरवरी में सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए गए आयात शुल्क की भरपाई का प्रयास है। जुलाई में अमेरिका ने 59 देशों और यूरोपीय संघ पर दोहरे अंक वाले टैरिफ लगाए थे। इनका आधार जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर पर्याप्त कार्रवाई न होना बताया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि आईईईपीए के तहत ऐसे टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं दिया गया है। इसके बाद प्रशासन को आयातकों को वसूली गई राशि लौटानी पड़ी थी।
इसके बाद राजस्व की कमी पूरी करने के लिए ट्रंप प्रशासन ने अस्थायी 10 प्रतिशत वैश्विक टैरिफ लागू किए, जिनकी अवधि 24 जुलाई को समाप्त हो गई। अब 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत अधिक स्थायी टैरिफ लगाए जा रहे हैं। यह प्रावधान राष्ट्रपति को अनुचित व्यापारिक गतिविधियों में शामिल देशों पर आयात शुल्क लगाने की अनुमति देता है। ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में भी चीन पर बड़े टैरिफ लगाने के लिए इसी धारा का उपयोग कर चुके हैं।
ट्रंप प्रशासन की नई टैरिफ दरें 10 से 12.5 प्रतिशत के बीच निर्धारित की गई हैं। इनका असर उन देशों पर पड़ेगा, जिनसे अमेरिका को 99 प्रतिशत आयात प्राप्त होता है। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता कुश देसाई ने कहा कि अमेरिका अपने वैध अधिकारों का इस्तेमाल कर रहा है। उनके अनुसार, जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर प्रभावी रोक नहीं लगाना अमेरिकी कारोबारों पर अतिरिक्त बोझ डालता है।
कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बोंटा ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप की आर्थिक नीति से आम अमेरिकियों की जीवनयापन लागत बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि टैरिफ वास्तव में कर के समान हैं और नागरिकों को इस अतिरिक्त आर्थिक बोझ का सामना नहीं करना चाहिए।















