मुंबई, 8 अगस्त।
समाज में बेटियों को लक्ष्मी कहा जाता है। उन्हें देवी का दर्जा दिया जाता है। माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी बेटियों को पालने-पोसने, पढ़ाने-लिखाने, आत्मनिर्भर बनाने और उनकी शादी कराने में लगा देते हैं। यह सोचकर कि वे बुढ़ापे की लाठी बनेंगी। लेकिन आज उसी रिश्ते का सबसे कड़वा सच समाज के सामने है।
मुंबई के बड़े कपड़ा व्यापारी रहे शिवचरण गुप्ता की कहानी इसी सच को उजागर करती है। उन्होंने अपनी तीन बेटियों को पाल-पोसकर बड़ा किया, पढ़ाया-लिखाया, उनकी शादी की और अपनी सामर्थ्य के अनुसार सब कुछ दिया। लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव पर जब वे बीमार हुए और उनका निधन हुआ, तब तीनों बेटियां नहीं पहुंचीं। मां की मृत्यु पर भी कोई नहीं आया और पिता के अंतिम संस्कार में भी समाज के लोगों को आगे आना पड़ा। वीडियो कॉल पर औपचारिकता निभाई गई, लेकिन कंधा देने तक कोई नहीं पहुंचा।
सोचिए, वह दर्द कितना बड़ा होगा जब एक पिता अपनी अंतिम सांसें ले रहा हो और उसे पता हो कि जिन बेटियों के लिए उसने सब कुछ किया, वे उसके पास नहीं हैं। जब अर्थी उठे और कंधा देने वाला कोई अपना न हो, जब मुखाग्नि कोई अनजान दे और खून के रिश्ते फोन पर संवेदना व्यक्त कर अपना कर्तव्य पूरा मान लें।
यह केवल शिवचरण गुप्ता का मामला नहीं, बल्कि आज के समय का आईना है। हम बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने की बात करते हैं, उन्हें उच्च शिक्षा दिलाते हैं और अच्छे घरों में विवाह कराते हैं, लेकिन रिश्तों की बुनियाद में संवेदना और संस्कार देना भूल जाते हैं। पढ़ाई के साथ यह भी सिखाना जरूरी है कि माता-पिता की बीमारी में साथ रहना, बुढ़ापे में उनका सहारा बनना और अंतिम समय में उनके पास होना सबसे बड़ा दायित्व है।
आज की पीढ़ी करियर और पैसे की दौड़ में इतनी आगे निकल गई है कि रिश्ते पीछे छूटते जा रहे हैं। शादी के बाद बेटियां अपने परिवार और बच्चों में व्यस्त हो जाती हैं। बूढ़े माता-पिता अकेले रह जाते हैं। फोन पर दो मिनट बात कर लेना ही कर्तव्य समझ लिया गया है और मृत्यु के बाद व्यस्तता सबसे बड़ा बहाना बन जाती है।
सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब जिन माता-पिता ने दिन-रात मेहनत कर बच्चों को इंसान बनाया, वही बच्चे अंतिम समय में मुंह मोड़ लेते हैं। यह केवल आर्थिक मदद का नहीं, भावनात्मक जुड़ाव का प्रश्न है। एक स्पर्श, एक आंसू और एक कंधा ही रिश्तों की असली पहचान होते हैं।
हमारे शास्त्रों में कहा गया है, "मातृ देवो भव, पितृ देवो भव।" लेकिन आज देवतुल्य माता-पिता को अकेला छोड़ दिया जाता है। यह आधुनिकता नहीं, आत्मकेंद्रितता है। समाज को सोचना होगा कि बच्चों को केवल डिग्री नहीं, संस्कार भी दिए जाएं। सफलता का वास्तविक पैमाना बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि बुढ़ापे में माता-पिता की आंखों का संतोष है। अंततः अर्थी के समय वही संस्कार साथ खड़े होते हैं, डिग्रियां नहीं।














