दिल्ली, 10 अगस्त।
भारतीय स्टेट बैंक की आधिकारिक हिंदी वेबसाइट पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुवाद और उससे जुड़े अस्वीकरण को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। शिकायतकर्ता प्रवीण कुमार जैन ने मामले में हस्तक्षेप की मांग करते हुए बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग, संसदीय राजभाषा समिति और वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग को पत्र भेजा है।
शिकायतकर्ता ने इसे केवल तकनीकी अनुवाद का मामला मानने के बजाय राजभाषा नीति और ग्राहकों के अधिकार से जुड़ा विषय बताया है। उनका कहना है कि बैंक की हिंदी वेबसाइट की सामग्री का अनुवाद ‘भाषिणी’ नामक कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली से किए जाने की जानकारी दी गई है।
शिकायत में वेबसाइट पर मौजूद उस अस्वीकरण पर भी आपत्ति जताई गई है, जिसमें अस्पष्टता होने पर अंग्रेजी सामग्री को मान्य मानने की बात कही गई है। शिकायतकर्ता का तर्क है कि आधिकारिक बैंकिंग वेबसाइट पर उपलब्ध हिंदी सामग्री को स्वयं बैंक की ओर से ही गैर-प्रामाणिक या संदिग्ध मानने की स्थिति नहीं बननी चाहिए।
प्रवीण कुमार जैन ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुवाद तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन महत्वपूर्ण बैंकिंग जानकारी को सार्वजनिक करने से पहले उसका मानवीय सत्यापन और प्रूफरीडिंग जरूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि पर्याप्त मानवीय जांच के बिना हिंदी सामग्री प्रकाशित करने से ग्राहकों के बीच भ्रम की स्थिति बन सकती है।
उनके अनुसार, हिंदी में बैंकिंग जानकारी हासिल करने वाले करोड़ों ग्राहकों के लिए सामग्री की विश्वसनीयता बेहद महत्वपूर्ण है। यदि अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी संस्करण को ही अंतिम माना जाएगा, तो अंग्रेजी का पर्याप्त ज्ञान नहीं रखने वाले ग्राहकों के सामने परेशानी पैदा हो सकती है।
शिकायतकर्ता ने इस व्यवस्था को राजभाषा अधिनियम, 1963 और राजभाषा नियम, 1976 की भावना के विपरीत बताया है। उनका कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के प्रमुख बैंक की आधिकारिक हिंदी सामग्री स्पष्ट, विश्वसनीय और ग्राहकों के लिए आसानी से समझ आने वाली होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि हिंदी भाषी ग्राहकों को बैंकिंग सेवाओं से जुड़ी जानकारी के लिए अंग्रेजी संस्करण पर निर्भर रहने की स्थिति नहीं आनी चाहिए। खासतौर पर केवल हिंदी में बैंकिंग सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों के लिए आधिकारिक हिंदी सामग्री की प्रामाणिकता महत्वपूर्ण है।
शिकायत में तीन प्रमुख मांगें रखी गई हैं। इनमें बैंक की वेबसाइट पर उपलब्ध पूरी हिंदी सामग्री का तत्काल मानवीय सत्यापन, अस्पष्टता की स्थिति में अंग्रेजी सामग्री को मान्य बताने वाले अस्वीकरण को हटाना और पहले संचालित प्रामाणिक हिंदी वेबसाइट व्यवस्था को बहाल करना शामिल है।
प्रवीण कुमार जैन ने कहा कि दूसरी भारतीय भाषाओं के लिए तकनीकी प्रयोग का विषय अलग हो सकता है, लेकिन राजभाषा हिंदी को केवल स्वचालित अनुवाद तक सीमित करना उचित नहीं है। उनके अनुसार, हिंदी को संवैधानिक दर्जा प्राप्त है और सरकारी संस्थानों की हिंदी सामग्री में गुणवत्ता तथा प्रामाणिकता बनाए रखना जरूरी है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जिस ग्राहक को अंग्रेजी का ज्ञान नहीं है, वह अंग्रेजी सामग्री के आधार पर महत्वपूर्ण बैंकिंग जानकारी कैसे समझ पाएगा। उनके अनुसार, जब बैंक की आधिकारिक वेबसाइट पर कोई जानकारी हिंदी में उपलब्ध कराई जाती है, तो ग्राहक को उस पर भरोसा करने का अधिकार होना चाहिए।
शिकायतकर्ता ने कहा कि तकनीक प्रशासनिक कामकाज को आसान बना सकती है, लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता से किए गए अनुवाद के साथ मानवीय निगरानी और जवाबदेही भी जरूरी है। उन्होंने संबंधित विभागों से मामले की जांच कर आवश्यक कदम उठाने की मांग की है।















