नई दिल्ली, 11 अगस्त।
'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' यानी ओडीओपी योजना अब उत्तर प्रदेश से निकलकर देश के 773 जिलों तक पहुंच चुकी है। संसद में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, इन जिलों में 1,244 विशिष्ट उत्पादों की पहचान की गई है। इससे स्थानीय उत्पादों को आर्थिक ताकत देने की दिशा में योजना के विस्तार की तस्वीर सामने आई है।
उत्तर प्रदेश में वर्ष 2018 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस पहल की शुरुआत की थी। उद्देश्य था कि हर जिले की पारंपरिक पहचान को आधुनिक तकनीक, वित्तीय मदद, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़कर आर्थिक विकास का आधार बनाया जाए। आगे चलकर यह अवधारणा केंद्र की आत्मनिर्भर भारत, वोकल फॉर लोकल और लोकल टू ग्लोबल जैसी पहलों से जुड़ गई।
योजना के तहत बनारस की रेशमी साड़ियां, मुरादाबाद का पीतल, भदोही के कालीन, फिरोजाबाद का कांच और सहारनपुर की लकड़ी की नक्काशी जैसे उत्पादों को नई बाजार पहुंच मिली। इनकी मांग देश के साथ विदेशों में भी बढ़ी है।
केंद्र सरकार ने इस मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करते हुए राज्यों के साथ मिलकर जिलों की विशिष्ट आर्थिक पहचान तय करने का अभियान शुरू किया। उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग की पहल के बाद अब 773 जिलों के 1,244 उत्पाद इस व्यवस्था में शामिल किए जा चुके हैं।
ओडीओपी को निर्यात केंद्र की पहल से भी जोड़ा गया है। वाणिज्य एवं उद्योग राज्यमंत्री जितिन प्रसाद के अनुसार, 734 जिलों में निर्यात की संभावनाओं वाले उत्पादों और सेवाओं की पहचान की गई है। सभी 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में राज्य तथा जिला निर्यात संवर्धन समितियां बनाई गई हैं।
इसके अलावा 249 जिला निर्यात कार्य योजनाएं तैयार हो चुकी हैं। इनका उद्देश्य उत्पादन से लेकर गुणवत्ता, पैकेजिंग, परिवहन, विपणन और निर्यात तक पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित करना है। इससे निर्यात नीति को गांव, कस्बे और जिले के स्तर तक ले जाने की कोशिश की गई है।
स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने के लिए सरकारी ई-मार्केटप्लेस पर विशेष ओडीओपी स्टोर बनाया गया है। इसमें 500 से अधिक उत्पाद श्रेणियों में 1,300 से ज्यादा उत्पाद उपलब्ध हैं। दस से अधिक राज्यों ने भी अपने अलग ऑनलाइन बिक्री मंच तैयार किए हैं, जिससे छोटे उत्पादक सीधे ग्राहकों तक पहुंच पा रहे हैं।
राष्ट्रीय व्यापार मेलों, प्रदर्शनियों और खरीदार-विक्रेता सम्मेलनों के माध्यम से भी इन उत्पादों को नए बाजार मिल रहे हैं। ऐसे कारीगरों और उत्पादकों के सामान अब स्थानीय हाट तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों और विदेशी बाजारों तक पहुंच रहे हैं।
ओडीओपी ने भारत की सांस्कृतिक विरासत को भी वैश्विक पहचान दिलाने में भूमिका निभाई है। विदेश मंत्रालय और विदेशों में भारतीय मिशनों के सहयोग से कई देशों में इन उत्पादों की प्रदर्शनियां लगाई जा रही हैं। भारतीय दूतावासों में ओडीओपी दीवारें बनाई गई हैं।
सिंगापुर में दो और कुवैत में एक अंतरराष्ट्रीय खुदरा केंद्र पर भारतीय ओडीओपी उत्पादों की बिक्री हो रही है। केंद्र सरकार ने विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और प्रतिनिधियों को दिए जाने वाले आधिकारिक उपहारों में भी ऐसे उत्पादों को शामिल करना शुरू किया है।
वरिष्ठ आर्थिक विश्लेषक प्रहलाद सबनानी के अनुसार, जिलों की अपनी क्षमता के आधार पर उत्पादन, गुणवत्ता और निर्यात केंद्र के रूप में उभरने से देश का विकास अधिक संतुलित, समावेशी और टिकाऊ बन रहा है। उनके मुताबिक, ओडीओपी अब जिला आधारित आर्थिक विकास मॉडल का रूप ले चुका है।
सबनानी ने कहा कि योजना ने कारीगरों, बुनकरों, शिल्पकारों, किसानों, महिला स्वयं सहायता समूहों और सूक्ष्म उद्यमियों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ा है। इससे रोजगार और स्थानीय आय बढ़ने के साथ गांवों से शहरों की ओर पलायन को नियंत्रित करने में भी मदद मिली है।















