नई दिल्ली, 11 अगस्त।
सुबह आंख खुलते ही हाथ मोबाइल ढूंढता है, रात सोने से पहले भी आखिरी नजर स्क्रीन पर ही टिकती है। पूरे दिन में हम कितनी बार स्क्रीन देखते हैं, इसका हिसाब लगाना मुश्किल है। काम, पढ़ाई, मनोरंजन, दोस्ती, खरीदारी, सब कुछ अब एक छोटी सी स्क्रीन में सिमट गया है। सुविधा बहुत बढ़ी है, लेकिन इसके साथ एक चुपचाप बढ़ता हुआ खतरा भी आया है और वह है अधिक समय तक स्क्रीन पर रहने की लत। यह अब केवल व्यक्तिगत आदत नहीं, घर की समस्या बन गई है। बच्चे, बूढ़े, जवान सभी इस डिजिटल जाल में फंसते जा रहे हैं और इसका असर शरीर, दिमाग और रिश्तों पर साफ दिखने लगा है।
सबसे पहले चोट आंखों पर पड़ती है। लगातार स्क्रीन देखने से आंखों में जलन, सूखापन, धुंधला दिखना और सिरदर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं। डॉक्टर इसे डिजिटल आई स्ट्रेन कहते हैं। बच्चों में भी आंखों पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंता बढ़ रही है। रात को देर तक मोबाइल चलाने से नींद प्रभावित होती है। स्क्रीन की रोशनी मेलाटोनिन नामक हार्मोन के सामान्य स्राव को प्रभावित कर सकती है, जो नींद के लिए जरूरी है। नींद पूरी न हो तो अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन और काम में मन न लगने की शिकायत आम हो जाती है।
शरीर भी स्क्रीन की गुलामी से बच नहीं पा रहा है। पहले बच्चे शाम होते ही मैदान में दौड़ते थे, अब वे कमरे में बैठकर ऑनलाइन गेम खेलते हैं। पहले लोग दोस्तों से मिलने जाते थे, अब वीडियो कॉल पर बात कर लेते हैं। शारीरिक गतिविधि कम होने से मोटापा और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। लगातार झुककर बैठने से गर्दन और रीढ़ में दर्द होने लगा है, जिसे टेक नेक कहा जाता है। घंटों टाइपिंग और स्क्रॉलिंग से हाथ और कलाई में भी दर्द हो सकता है। बच्चों के लिए यह स्थिति ज्यादा चिंताजनक है, क्योंकि उनके शारीरिक विकास के लिए खेलना और बाहर समय बिताना जरूरी है।
सबसे गहरा असर दिमाग और रिश्तों पर पड़ रहा है। अधिक स्क्रीन टाइम से ध्यान भटकने की समस्या बढ़ रही है। थोड़ी देर में नोटिफिकेशन चेक करने की आदत ने एकाग्रता को प्रभावित किया है। पढ़ाई और लंबे समय तक किसी काम पर ध्यान लगाना कठिन होता जा रहा है। सोशल मीडिया और शॉर्ट वीडियो की लगातार खपत दिमाग को बार-बार नए उत्तेजक कंटेंट की तलाश में रखती है। इसका असर चिड़चिड़ेपन, अकेलेपन और मानसिक तनाव के रूप में दिखाई दे सकता है। बच्चे असली दोस्तों से दूर होकर वर्चुअल दुनिया में ज्यादा समय बिता रहे हैं। साइबर बुलिंग, फर्जी खबरें और नकारात्मक कंटेंट ने इस तनाव को और बढ़ा दिया है।
बड़ों की स्थिति भी अलग नहीं है। ऑफिस का काम अब घर तक आ गया है। लैपटॉप बंद नहीं होता और रात तक मेल और मैसेज का जवाब देना पड़ता है। इससे काम और निजी जीवन के बीच की सीमा कमजोर हो गई है। परिवार के साथ बैठकर खाने के समय भी सब अपने फोन में व्यस्त रहते हैं। पति-पत्नी और बच्चे एक कमरे में होते हुए भी अलग-अलग दुनिया में होते हैं। लगातार अलर्ट और मैसेज चेक करने से दिमाग को आराम नहीं मिलता और तनाव तथा बर्नआउट बढ़ सकता है।
इस दलदल से निकला कैसे जाए? पूरी तरह स्क्रीन छोड़ना संभव नहीं है, क्योंकि नौकरी, पढ़ाई और बैंकिंग जैसी जरूरी गतिविधियां ऑनलाइन हैं। जरूरत स्क्रीन छोड़ने की नहीं, उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करने की है। सबसे पहला कदम है समय तय करना। बच्चों के स्क्रीन टाइम की स्पष्ट सीमा होनी चाहिए और पढ़ाई तथा जरूरी काम को मनोरंजन से अलग रखा जाना चाहिए। बड़ों को भी काम के बाद मनोरंजन के लिए स्क्रीन पर बिताए जाने वाले समय को सीमित करना चाहिए।
आंखों के लिए 20-20-20 का नियम अपनाया जा सकता है। हर 20 मिनट में 20 सेकंड के लिए करीब 20 फीट दूर देखें। हर एक घंटे में कुछ मिनट उठकर टहलें, हाथ-पैर स्ट्रेच करें और पानी पिएं। इससे शरीर की जकड़न कम होगी। स्क्रीन की ब्राइटनेस बहुत अधिक न रखें, अक्षरों का आकार जरूरत के अनुसार बड़ा रखें और स्क्रीन को आंखों से उचित दूरी पर रखें। फोन में नाइट मोड या ब्लू लाइट फिल्टर का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।
घर में स्क्रीन फ्री जोन बनाना जरूरी है। डाइनिंग टेबल और बेडरूम में मोबाइल ले जाने की आदत खत्म करनी चाहिए। खाने के समय परिवार से बातचीत हो और सोने से पहले कुछ समय गैजेट से दूरी रखी जाए। बच्चों के स्टडी टेबल पर मोबाइल न रखें, ताकि पढ़ाई में ध्यान लगा रहे। अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करना भी उपयोगी है, क्योंकि हर कुछ मिनट में आने वाला अलर्ट ध्यान भटकाता है।
असली दुनिया को वापस लाना होगा। बच्चों को पार्क में ले जाएं, खेल के लिए प्रोत्साहित करें, साइकिल चलवाएं और दोस्तों से मिलने का अवसर दें। स्कूलों में खेल और कला को पढ़ाई जितना ही महत्व मिलना चाहिए। बड़ों को भी सुबह-शाम वॉक, योग और व्यायाम के लिए समय निकालना चाहिए। शरीर सक्रिय रहेगा तो दिमाग भी बेहतर तरीके से काम करेगा।
डिजिटल डिटॉक्स के लिए सप्ताह में कुछ घंटे या एक दिन स्क्रीन से दूरी बनाने का प्रयास किया जा सकता है। उस समय परिवार के साथ खाना बनाएं, किताब पढ़ें, खेलें, बातचीत करें या बाहर घूमें। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि मनोरंजन और संवाद के लिए स्क्रीन ही एकमात्र माध्यम नहीं है। महीने में एक बार कुछ घंटों के लिए फोन से पूरी तरह दूर रहना भी अपनी आदतों को समझने का अच्छा तरीका हो सकता है।
इस लड़ाई में माता-पिता और शिक्षक सबसे बड़ी ताकत हैं। बच्चों को छोटी उम्र से समझाना होगा कि इंटरनेट पर मौजूद हर जानकारी सच नहीं होती और तकनीक का संतुलित इस्तेमाल जरूरी है। माता-पिता को खुद उदाहरण बनना होगा। अगर बड़े हर समय फोन में व्यस्त रहेंगे तो बच्चों से संयम की उम्मीद कैसे की जा सकती है? स्कूलों में डिजिटल स्वास्थ्य और सुरक्षित इंटरनेट उपयोग के बारे में भी जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए।
सरकार और कंपनियों की भी जिम्मेदारी है। सोशल मीडिया कंपनियों को बच्चों के लिए बेहतर पैरेंटल कंट्रोल और समय सीमा के विकल्प देने चाहिए। स्कूलों में खेल, कला और वास्तविक सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि बच्चों का जीवन केवल स्क्रीन तक सीमित न रह जाए।
स्क्रीन बुरी नहीं है, गलत है उसका गलत और जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल। अगर हम स्क्रीन को अपना मालिक बना लेंगे तो वह हमारी जिंदगी पर हावी हो जाएगी, लेकिन अगर उसे औजार की तरह इस्तेमाल करेंगे तो वह जिंदगी आसान बनाएगी। संतुलन ही असली कुंजी है। जरूरत के लिए स्क्रीन का उपयोग करें, मनोरंजन के लिए सीमित करें और लत को जीवन का हिस्सा न बनने दें।
आज से ही शुरुआत की जा सकती है। अपना स्क्रीन टाइम चेक करें, उसे धीरे-धीरे कम करने का लक्ष्य रखें। हर दिन कुछ समय स्क्रीन फ्री निकालें। परिवार से बात करें, दोस्तों से मिलें, किताब पढ़ें और धूप में टहलें। कुछ ही समय में फर्क महसूस होगा - नींद बेहतर होगी, तनाव कम होगा और रिश्तों में अपनापन लौटेगा।
जिंदगी स्क्रीन के चार इंच में नहीं है। जिंदगी खुले आसमान में, हरे पेड़ों में, दोस्तों की हंसी में और परिवार की बातों में है। अगर हमने आज ध्यान नहीं दिया तो कल बहुत देर हो सकती है। इसलिए स्क्रीन की लत को जिंदगी पर भारी मत होने दीजिए। स्क्रीन का उपयोग कीजिए, उपयोग होने मत दीजिए।















