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संपादकीय
11 Aug, 2026

ऑपरेशन हमदर्द बना बेसहारों का सहारा

मध्य प्रदेश में एक महीने चले ऑपरेशन हमदर्द के तहत जीआरपी ने 2057 बेसहारा लोगों की मदद की और 159 लोगों को उनके परिवारों से मिलाया।

भोपाल, 11 अगस्त।

मध्य प्रदेश के रेलवे स्टेशनों पर हर दिन हजारों लोग आते-जाते हैं। कुछ अपने गंतव्य तक पहुंच जाते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं, जो भटककर रह जाते हैं। जिनके पास न घर होता है, न ठिकाना, न खाने की व्यवस्था और न इलाज की सुविधा। मानसिक रूप से बीमार बुजुर्ग, नशे की गिरफ्त में आए युवा और घर से रूठकर निकले बच्चे अक्सर प्लेटफार्मों पर रात गुजारते हैं और धीरे-धीरे उनकी जिंदगी स्टेशन की बेंच और फुटपाथ बन जाती है। ऐसे ही बेसहारा और असहाय लोगों को सहारा देने के लिए जीआरपी ने ऑपरेशन हमदर्द चलाया और एक महीने के भीतर इस अभियान ने सैकड़ों टूटी हुई जिंदगियों को फिर से जोड़ने का काम किया।

एक जुलाई से 31 जुलाई तक चले इस विशेष अभियान के तहत भोपाल, इंदौर और जबलपुर रेल मंडल के प्रमुख स्टेशनों पर जीआरपी की टीमों ने गहन गश्त की और स्टेशनों, ट्रेनों, वेटिंग रूम और प्लेटफार्मों पर भटक रहे लोगों को चिन्हित किया। अभियान के आंकड़े बताते हैं कि कुल 2057 लोगों को मदद पहुंचाई गई। इनमें 1556 पुरुष, 404 महिलाएं, 39 बालक-बालिकाएं और 2 ट्रांसजेंडर शामिल थे। इन सभी को अलग-अलग श्रेणियों में रखकर मदद दी गई। 159 लोगों को उनके परिजनों से मिलाया गया, 39 लोगों को, जिनके पास जाने की कोई जगह नहीं थी, शेल्टर होम और रैन बसेरों में भेजा गया और 1790 लोगों को समझाइश देकर उनके घर भेजा गया या उनके परिजनों को सूचना देकर बुलाया गया।

इस अभियान की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसमें केवल आंकड़ों पर काम नहीं हुआ, बल्कि हर व्यक्ति की कहानी को समझा गया। टीमों ने देखा कि बहुत से लोग मानसिक बीमारी के कारण घर से निकल आए हैं और अपना नाम-पता तक नहीं बता पा रहे हैं। कुछ बुजुर्ग ऐसे थे, जिन्हें बच्चे संभाल नहीं पाए और वे घर से निकलकर स्टेशन पहुंच गए। कुछ युवा नशे और बेरोजगारी के कारण घर छोड़कर आ गए और कुछ महिलाएं घरेलू हिंसा से परेशान होकर ट्रेन पकड़कर निकल पड़ीं। जीआरपी ने इन सभी की काउंसलिंग की, उन्हें भोजन, पानी और जरूरी दवाएं उपलब्ध कराईं और फिर उनकी स्थिति के अनुसार आगे की व्यवस्था की।

159 लोगों को परिजनों से मिलवाना आसान नहीं था, क्योंकि इनमें से अधिकांश अपना पता नहीं बता पा रहे थे। ऐसे में जीआरपी ने तकनीक का सहारा लिया। फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर डाले गए, स्थानीय अखबारों और टीवी चैनलों के माध्यम से अपील की गई और अन्य राज्यों की पुलिस से भी संपर्क किया गया। इस मेहनत का नतीजा यह निकला कि बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र तक से परिजन भोपाल और इंदौर पहुंचे और अपने अपनों को लेकर गए। कई परिवारों के लिए यह पल भावुक कर देने वाला था। वर्षों बाद अपने लापता सदस्य को देखकर उनकी आंखों में आंसू थे और उन्होंने जीआरपी का खुलकर धन्यवाद किया।

39 लोगों को शेल्टर होम भेजने का निर्णय भी बहुत सोच-समझकर लिया गया। इनमें वे लोग शामिल थे, जिनका कोई घर नहीं था या जिनके परिजन उन्हें लेने से इनकार कर रहे थे। इन लोगों के लिए शेल्टर होम में रहने, खाने और इलाज की व्यवस्था की गई। साथ ही उन्हें कौशल प्रशिक्षण देने की योजना भी बनाई गई, ताकि वे आगे चलकर आत्मनिर्भर बन सकें। सामाजिक संस्थाओं ने इस काम में जीआरपी का पूरा साथ दिया और कई स्वयंसेवी संगठनों ने आगे आकर इन लोगों के पुनर्वास का जिम्मा लिया।

सबसे बड़ी संख्या 1790 लोगों की थी, जिन्हें समझाइश देकर घर भेजा गया। इनमें ज्यादातर ऐसे लोग थे, जो किसी छोटी बात पर नाराज होकर घर से निकले थे या काम की तलाश में भटकते हुए स्टेशन पहुंच गए थे। जीआरपी की टीमों ने उनसे घंटों बात की, उनकी समस्या सुनी और उन्हें समझाया कि घर से दूर रहने से समस्या का समाधान नहीं होता। कई मामलों में टीम ने उनके घर फोन करके परिजनों को बुलाया और बीच-bचाव करके उन्हें वापस भेजा। इस प्रक्रिया में धैर्य और संवेदनशीलता की सबसे ज्यादा जरूरत थी और जीआरपी के जवानों ने यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई।

ऑपरेशन हमदर्द की सफलता के पीछे जीआरपी के वरिष्ठ अधिकारियों की दूरदर्शिता भी थी। भोपाल के पुलिस आयुक्त हरिश राय और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने स्वयं स्टेशनों का दौरा किया और जवानों का हौसला बढ़ाया। भोपाल की महापौर मालती राय ने भी इस अभियान की सराहना की और कहा कि शहर की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है, बल्कि समाज की भी है। उन्होंने कहा कि 2047 तक विकसित भारत का सपना तभी पूरा होगा, जब हम समाज के सबसे कमजोर वर्ग का ध्यान रखेंगे। जब तक कोई भी व्यक्ति भूखा या बेसहारा रहेगा, तब तक हमारा विकास अधूरा है।

इस अभियान से एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई। रेलवे स्टेशन समाज का आईना हैं। यहां हमें समाज की हर बीमारी दिखाई देती है। गरीबी, बेरोजगारी, मानसिक बीमारी, घरेलू हिंसा और टूटते हुए परिवार, सभी कुछ यहां एक साथ दिखाई देते हैं। इसलिए केवल पुलिस के भरोसे इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इसके लिए समाज को भी आगे आना होगा। स्कूलों, कॉलेजों और मोहल्लों में जागरूकता अभियान चलाने होंगे, ताकि लोग मानसिक बीमारी को कलंक न समझें और समय रहते मदद लें। परिवारों में संवाद बढ़ाना होगा, ताकि बच्चे और बुजुर्ग घर से रूठकर न निकलें।

ऑपरेशन हमदर्द जैसे अभियान को नियमित रूप से चलाया जाना चाहिए और इसे केवल एक महीने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। स्टेशनों पर स्थायी हेल्प डेस्क बनाई जाएं, जहां कोई भी व्यक्ति मदद मांग सके। स्वयंसेवकों की टीम बनाई जाए, जो रोजाना गश्त करे और तकनीक का अधिक से अधिक उपयोग किया जाए। फेस रिकग्निशन और आधार लिंकिंग से लापता लोगों को जल्दी खोजा जा सकता है। साथ ही शेल्टर होम की संख्या भी बढ़ानी होगी, ताकि मदद मांगने वाले हर व्यक्ति को तुरंत सहारा मिल सके।

इस अभियान ने पुलिस की छवि को भी बदला है। अक्सर लोग पुलिस को केवल चालान काटने और अपराध रोकने वाली मशीन समझते हैं, पर ऑपरेशन हमदर्द ने दिखाया कि वर्दी के पीछे भी एक दिल होता है, जो इंसानियत की पुकार सुनता है। जब एक जवान एक बेसहारा बुजुर्ग को अपने हाथों से खाना खिलाता है, जब एक महिला अधिकारी एक भटकी हुई लड़की को सहारा देकर उसके घर भेजती है, तो वह केवल ड्यूटी नहीं होती, वह मानवता होती है और यही मानवता समाज को जोड़कर रखती है।

आगे की राह भी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि स्टेशनों पर बेसहारा लोगों की संख्या कम नहीं है। हर दिन नए लोग आते हैं और पुराने लोग निकल जाते हैं। इसलिए जरूरी है कि इस अभियान को एक आंदोलन का रूप दिया जाए। रेलवे प्रशासन, राज्य सरकार, सामाजिक संगठन और आम जनता सभी को मिलकर काम करना होगा, ताकि कोई भी व्यक्ति स्टेशन पर भूखा न सोए, कोई भी बीमार व्यक्ति बिना इलाज के न रहे और कोई भी बच्चा अपने परिवार से दूर न भटके।

ऑपरेशन हमदर्द ने यह साबित कर दिया है कि अगर नीयत साफ हो और मेहनत सच्ची हो, तो बड़े से बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। 2057 लोगों तक पहुंचाना अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। यह आंकड़ा उन 159 परिवारों की खुशी का प्रतीक है, जो अपने अपनों से फिर मिले, उन 39 लोगों की नई उम्मीद का प्रतीक है, जिन्हें अब रहने की जगह मिली और उन 1790 लोगों की सीख का प्रतीक है, जिन्हें समझाकर घर भेजा गया। अब जरूरत है कि इस पहल को आगे बढ़ाया जाए और इसे एक स्थायी व्यवस्था का रूप दिया जाए, ताकि मध्य प्रदेश के रेलवे स्टेशन सचमुच सफर की शुरुआत और मंजिल दोनों बन सकें, न कि बेसहारों की अंतिम जगह।

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