भोपाल, 12 अगस्त।
भागदौड़ भरी जिंदगी और कंक्रीट के जंगलों से ऊब चुके शहरी लोग अब सुकून की तलाश में शहरों से दूर गांवों का रुख कर रहे हैं, जहां न ट्रैफिक का शोर है, न प्रदूषण की धुंध और न समय की कोई दौड़। यहां खुला आसमान है, हरी फसलें हैं, मिट्टी की खुशबू है और अपनापन है। पिछले कुछ सालों में वीकेंड टूरिज्म का यह नया ट्रेंड तेजी से बढ़ा है। लोग अब महंगे होटलों और भीड़ भरे हिल स्टेशनों की जगह गांवों में दो दिन बिताना पसंद कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि असली भारत गांवों में बसता है और उसे करीब से देखने-समझने का मौका पर्यटन के जरिए मिल सकता है। मध्यप्रदेश में भी यह बदलाव साफ दिख रहा है। भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर जैसे शहरों से लोग वीकेंड पर बुंदेलखंड, बघेलखंड और निमाड़ के गांवों की ओर निकल पड़ते हैं। उन्हें स्थानीय संस्कृति, खानपान और जीवनशैली का अनुभव चाहिए, जो शहरों में आसानी से नहीं मिलता।
इस नए पर्यटन मॉडल को ग्रामीण पर्यटन या होमस्टे पर्यटन कहा जा रहा है। इसमें शहर से आने वाले मेहमान गांव के किसी घर में रुकते हैं, वहां का खाना खाते हैं, खेतों में घूमते हैं, लोकगीत सुनते हैं और गांव वालों के साथ समय बिताते हैं। यह न लग्जरी टूर है और न पिकनिक। यह एक ऐसा अनुभव है, जो इंसान को उसकी जड़ों से जोड़ता है। कोरोना के बाद जब लोग महीनों घरों में बंद रहे तो उन्हें प्रकृति और अपनों के साथ बिताए समय का महत्व समझ आया। इसी दौर के बाद ग्रामीण पर्यटन को गति मिली। सरकार भी इसे बढ़ावा दे रही है, क्योंकि इससे शहर के लोगों को राहत और गांव के लोगों को रोजगार मिलता है। भोपाल से करीब दो घंटे की दूरी पर स्थित गांवों में होमस्टे शुरू हो गए हैं। यहां सीमित खर्च में रहने, खाने और घूमने की व्यवस्था मिल जाती है। मिट्टी के घर में सोने का अनुभव, चूल्हे पर बनी रोटी और दाल का स्वाद, खेतों के बीच सुबह की सैर और रात में तारों के नीचे बैठकर बातें करना, यह सब शहर का कोई होटल नहीं दे सकता। भोपाल के पास सांची, रायसेन और बेतवा के किनारे बसे गांव वीकेंड डेस्टिनेशन बन रहे हैं। जबलपुर से लोग बरगी और कान्हा के आसपास के गांवों में जाते हैं, जबकि इंदौर से महू के आसपास के आदिवासी गांवों में पर्यटकों की आवाजाही बढ़ी है।
इस ट्रेंड का सबसे बड़ा फायदा गांव की महिलाओं और युवाओं को हुआ है। पहले जिन महिलाओं के पास आय का साधन नहीं था, वे अब होमस्टे चलाकर आत्मनिर्भर बन रही हैं। मालवा के खारी गांव की महिलाएं बांस की टोकरियां बनाकर बेचती थीं। अब वे पर्यटकों को टोकरियां दिखाती हैं, उन्हें बुनना सिखाती हैं और लोकगीत भी सुनाती हैं। बुंदेलखंड के राधापुर, बागन और लाड़पुरा जैसे गांवों में महिलाएं समूह बनाकर मड़वे की रोटी, साग और बेसन के लड्डू बनाकर परोसती हैं। इससे गांव की पहचान और आमदनी दोनों बढ़ती हैं। युवाओं को गाइड और संचालक के रूप में काम मिल रहा है। वे मेहमानों को जंगल, नदी और ऐतिहासिक जगहें दिखाते हैं और सम्मान के साथ आय अर्जित करते हैं।
शहरी लोग भी इस अनुभव को पसंद कर रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि ऑफिस और स्क्रीन से थकने के बाद गांव की शांति मानसिक राहत देती है। कुछ माता-पिता बच्चों को गांव इसलिए ले जाते हैं ताकि वे समझ सकें कि दूध गाय से और सब्जी खेत से आती है। एक आईटी प्रोफेशनल ने बताया कि होमस्टे में रहकर उसने सीखा कि कम संसाधनों में भी खुश रहा जा सकता है। गांव वालों की दिनचर्या और आपसी मेलजोल शहर के लोगों के लिए सीख का विषय बन रहा है।
इस पर्यटन का असर स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। पहले गांव के लोग अपनी उपज सस्ते में बेचकर शहर आते थे, अब शहर के लोग खुद गांव पहुंचकर जैविक सब्जी, दूध, घी और हस्तशिल्प खरीद रहे हैं। बांस के सामान, मिट्टी के बर्तन और हाथ से बने कपड़े सीधे पर्यटकों को बेचे जा रहे हैं। इससे बिचौलियों की भूमिका घटती है और मुनाफा उत्पादक तक पहुंचता है। कुछ गांवों में युवाओं ने साइकिल टूर और नदी में बोटिंग जैसी गतिविधियां भी शुरू की हैं। इससे रोजगार के नए अवसर बन रहे हैं।
सरकार और स्वयंसेवी संगठन भी ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा दे रहे हैं। कई गांवों में साफ पानी, शौचालय और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। महिलाओं को मेहमानों से व्यवहार, भोजन और सुरक्षा से जुड़े प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं। बैंक छोटे ऋण उपलब्ध करा रहे हैं, ताकि लोग अपने घरों को होमस्टे में बदल सकें। पंचायतें भी पर्यटन को आय का साधन मानकर गांव की सफाई और सौंदर्यीकरण पर ध्यान दे रही हैं।
हालांकि चुनौतियां भी हैं। कई गांवों तक अच्छी सड़क नहीं है, इंटरनेट की सुविधा सीमित है और कुछ जगह पानी की समस्या है। दूसरी चुनौती प्रशिक्षण की है। शहरी मेहमान और गांव वाले एक-दूसरे की आदतों को हमेशा आसानी से नहीं समझ पाते। गर्मी और बरसात में पर्यटकों की संख्या भी कम हो जाती है। इसलिए ग्रामीण पर्यटन को केवल मौसमी गतिविधि न बनाकर पूरे साल की योजना के रूप में विकसित करना होगा।
यह सिर्फ पर्यटन नहीं, दो भारतों को जोड़ने का पुल भी है। एक भारत तेज रफ्तार वाला है और दूसरा धीमी गति से जीता है। जब दोनों मिलते हैं तो समझ और आपसी सम्मान बढ़ता है। शहर का व्यक्ति गांव की मेहनत देखता है और गांव का व्यक्ति शहर की सोच समझता है। प्रकृति के करीब आने से पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी बढ़ती है। युवा अब गांव में रहकर जैविक खेती, हस्तशिल्प, फोटोग्राफी और डिजिटल कारोबार जैसे नए काम कर रहे हैं। सरकार इसे कौशल विकास और आत्मनिर्भरता से जोड़े तो ग्रामीण पर्यटन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बन सकता है।
शहरों से गांवों की ओर हो रहा यह रुझान एक तरह का उल्टा पलायन है। पहले लोग रोजगार के लिए गांव से शहर जाते थे, अब सुकून के लिए शहर से गांव आ रहे हैं। यह बदलाव बताता है कि विकास का अर्थ केवल ऊंची इमारतें नहीं, खुशहाल जीवन भी है। मिट्टी की सौंधी खुशबू, चूल्हे की रोटी, खेतों की हरियाली और लोगों का अपनापन हमारी असली धरोहर हैं। वीकेंड टूरिज्म इन्हें सहेजने का माध्यम बन सकता है, जहां शहर का आदमी सुकून पाता है और गांव का आदमी सम्मान और रोजगार।
अगली बार वीकेंड आए तो किसी हिल स्टेशन की बजाय किसी गांव का रुख कीजिए। वहां के लोगों से बात कीजिए, उनका खाना खाइए और उनकी कहानी सुनिए। संभव है कि लौटते समय आपके साथ सिर्फ तस्वीरें नहीं, बल्कि जीवन को देखने का एक नया नजरिया भी हो।















