रायपुर, 12 अगस्त।
15 अगस्त को राष्ट्रपति भवन में होने वाले स्वतंत्रता दिवस के स्वागत समारोह ‘एट होम’ में छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक एवं जनजातीय विरासत को खास स्थान मिलेगा। स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ के अवसर पर होने वाले आयोजन में छत्तीसगढ़ के साथ गोवा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की पारंपरिक कला और सांस्कृतिक परंपराओं को प्रस्तुत किया जाएगा।
छत्तीसगढ़ की ओर से गेंड़ी और गौर मड़िया नृत्य समारोह के प्रमुख आकर्षण रहेंगे। हरेली पर्व से जुड़ा गेंड़ी नृत्य ऊंची बांस की गेंड़ियों पर संतुलन और कौशल का प्रदर्शन करता है। यह बस्तर क्षेत्र के मुड़िया और गोंड जनजातीय समुदायों की परंपरा से जुड़ा है और वर्षा ऋतु की शुरुआत में हरेली तिहार पर किया जाता है।
गौर मड़िया नृत्य बस्तर के मड़िया समुदाय की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है। पारंपरिक पोशाक और विशेष शिरोभूषण के साथ होने वाली यह प्रस्तुति जनजातीय जीवन, वीरता और प्रकृति के साथ समुदाय के संबंध को दर्शाती है।
समारोह में चारों राज्यों के करीब 35 कलाकार लोक नृत्य और पारंपरिक संगीत पेश करेंगे। इनमें लावणी, तुतारी, सोंगी मुखावटे, गेंड़ी, गौर मड़िया, भगोरिया, बैगा करमा, सामई और घोड़े मोडनी जैसी प्रस्तुतियां शामिल होंगी।
सांस्कृतिक कार्यक्रम को भारत की अलग-अलग लोक परंपराओं की यात्रा के रूप में तैयार किया गया है। शुरुआत छत्तीसगढ़ और बस्तर की अनुष्ठानिक परंपराओं पर आधारित मंगल धुन से होगी। इसके बाद महाराष्ट्र, गोवा और मध्य प्रदेश की संगीत परंपराओं की प्रस्तुतियां होंगी। अंत में चारों राज्यों के कलाकार संयुक्त प्रस्तुति देंगे।
कार्यक्रम का संगीत संयोजन छत्तीसगढ़ के लोक गायक, संगीतकार, लेखक और रंगकर्मी राकेश कुमार तिवारी ने किया है। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित तिवारी छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के संरक्षण और संवर्धन के लिए जाने जाते हैं।
प्रस्तुति में बालोद और नारायणपुर जिले के कलाकार भी शामिल होंगे। बालोद के कलाकार मोहरी, दफड़ा, दमाऊ, गुड़ुम और बांसुरी जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाएंगे। नारायणपुर के कलाकार गुटा परई, नार परई, ढोल और कुंदिर के माध्यम से बस्तर की संगीत परंपरा प्रस्तुत करेंगे।
राष्ट्रपति भवन के इस आयोजन में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को केवल नृत्य और संगीत तक सीमित नहीं रखा गया है। राज्य की पारंपरिक शिल्प और वस्त्र परंपराओं को भी प्रस्तुति का हिस्सा बनाया गया है।
ढोकरा और बस्तर के पारंपरिक लौह शिल्प के साथ पनिका बुनाई को प्रदर्शित किया जाएगा। इसके साथ महाराष्ट्र की करवत काठी साड़ी, गोवा की कुंभी साड़ी और मध्य प्रदेश की महेश्वरी बुनाई भी साझा प्रस्तुति में शामिल होगी।
इस वर्ष की प्रस्तुति का प्रमुख संदेश सांस्कृतिक विरासत और पर्यावरण संरक्षण के संबंध पर केंद्रित है। बस्तर की पारंपरिक जीवनशैली, शिल्प और पवित्र उपवनों के संरक्षण के माध्यम से समुदाय और प्रकृति के सह-अस्तित्व को सामने रखा जाएगा।
राष्ट्रपति भवन के राष्ट्रीय मंच पर छत्तीसगढ़ की लोक एवं जनजातीय कला, बस्तर की संगीत परंपरा, पारंपरिक वाद्ययंत्र, हस्तशिल्प और पनिका बुनाई की झलक दिखाई देगी। इसके माध्यम से राज्य की सांस्कृतिक विविधता, मौलिकता और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली को देश के सामने प्रस्तुत किया जाएगा।















