औरैया, 12 अगस्त।
उत्तर प्रदेश के औरैया जनपद के इतिहास में 12 अगस्त की तिथि स्वाधीनता के आंदोलन के दौरान अत्यंत गौरवशाली एवं सर्वोच्च बलिदान की प्रतीक मानी जाती है। ठीक इसी दिन सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के महासमर में साहसी क्रांतिकारियों ने औरैया सदर तहसील पर गर्व से लहरा रहे ब्रिटिश राज के प्रतीक यूनियन जैक को बलपूर्वक नीचे उतारकर उसकी जगह पर आन, बान और शान का प्रतीक तिरंगा फहरा दिया था। उस ऐतिहासिक संघर्ष के दरमियान अंग्रेजी हुकूमत के क्रूर दमन चक्र के चलते छह वीर क्रांतिकारी शहीद हो गए थे और पचास से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। इस स्वर्णिम घटना की याद में बुधवार के रोज सदर तहसील और शहीद पार्क में विशेष कार्यक्रमों का आयोजन कर अमर शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
इस गौरवशाली आंदोलन की संपूर्ण कमान संभालने वाले क्रांतिकारियों की प्रमुख तिकड़ी में छक्कीलाल दुबे, बल्देव प्रसाद उर्फ बल्दू पहलवान तथा हाफिज करीम शामिल थे। इनमें से बल्दू पहलवान का योगदान और व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। उनके परिवार के सदस्यों के अनुसार उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के कठिन दौर में आम लोगों को अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जागरूक करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी।
गांव-गांव जाकर जगाई थी आजादी की अलख
वर्ष 1886 में औरैया के समीपस्थ सनावली गढ़िया गांव की पावन भूमि पर जन्मे बल्देव प्रसाद उर्फ बल्दू पहलवान अपने बचपन के दिनों से ही हर प्रकार के अन्याय के विरुद्ध खुलकर आवाज उठाने के लिए प्रसिद्ध थे। वे रात्रि के समय लोगों की सुरक्षा के लिए टोली बनाकर गश्त किया करते थे और उनकी जान-माल की रक्षा का जिम्मा उठाते थे। पश्चात में स्वाधीनता आंदोलन में पूरी तरह सक्रिय होकर उन्होंने जालौन, पुखरायां, डेरापुर, फर्रुखाबाद तथा कन्नौज समेत अनेक आसपास के क्षेत्रों में विशाल जनसभाओं का आयोजन कर जनता को अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ जागृत किया।
वर्ष 1930 के प्रसिद्ध लगानबंदी आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने के कारण ब्रिटिश सरकार ने बदनपुर स्थित उनकी 14 बीघा उपजाऊ भूमि को जब्त कर लिया था। उन्हें छह माह के बेहद कठोर कारावास की सजा के साथ-साथ भारी आर्थिक दंड का सामना भी करना पड़ा था।
जीवन में लड़ीं 75 कुश्तियां, एक में भी नहीं मिली हार
परिवार के बुजुर्गों के संस्मरणों के अनुसार बल्दू पहलवान अपने युग के अत्यंत नामचीन पहलवानों में शुमार किए जाते थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग 75 बड़ी कुश्तियां लड़ीं और किसी भी मुकाबले में कभी पराजय का मुंह नहीं देखा। अखाड़े या दंगल में पुरस्कार के रूप में मिलने वाली समस्त इनाम राशि को वे हमेशा गरीबों और जरूरतमंद लोगों में दान कर देते थे। लगभग 80 वर्ष की आयु तक वे विभिन्न दंगलों में निष्पक्ष निर्णायक की भूमिका निभाते रहे। उनका सीधा संपर्क ऐतिहासिक काकोरी कांड के नायक अमर शहीद मुकुंदीलाल से भी रहा था। मार्च 1971 में 86 वर्ष की दीर्घ आयु में उनका देहावसान हो गया।
शहीद पार्क और तहसील परिसर में दी गई श्रद्धांजलि
स्वतंत्रता संग्राम के इन अमर वीर सपूतों की पावन स्मृति में शहीद पार्क के भीतर भी भव्य कार्यक्रम संपन्न हुआ। बुधवार की प्रातः 11 बजे नगर पालिका अध्यक्ष अनूप गुप्ता ने स्वाधीनता आंदोलन में औरैया के वीर सपूतों के ऐतिहासिक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उनके अतुलनीय संघर्ष और बलिदान को याद किया।
दूसरी ओर सदर तहसील परिसर में एसडीएम ब्रह्मानंद, नगर पालिका परिषद के सफाई निरीक्षक आशीष पांडेय सहित अन्य गणमान्य लोगों ने वीर स्तंभ पर पुष्प चक्र अर्पित कर शहीदों को नमन किया। इस गरिमामयी अवसर पर ज्ञानेंद्र दुबे, प्रवीण गुप्ता, अनिल सेंगर, विवेक पोरवाल, आनंद नाथ गुप्ता, राजेंद्र बाजपेई, विशाल परिहार समेत भारी संख्या में अन्य लोग भी उपस्थित रहे।















