साहब के कहने पर नोटिस का जवाब नहीं दिया। सोचा था बड़े साहब हैं, मामला बाद में निपटा देंगे। बड़े साहब भरोसा देकर खुद राजधानी से राजधानी चले गए। अब मामला लटका है और जवाब देने की बारी उन साहब की है, जिन्होंने भरोसे में कलम रोक ली थी।
जिनके भरोसे फाइल को लटकाए रखा, वही अब सहारा छोड़कर दूसरी राजधानी पहुंच गए हैं। इधर साहब की उम्मीद भी धुंधली पड़ती जा रही है और फाइल का वजन बढ़ता जा रहा है। अब साहब समझ नहीं पा रहे कि भरोसा किस पर करें और जवाब किसे दें।















