नई दिल्ली, 13 अगस्त।
सुप्रीम कोर्ट ने अधिक चीनी, नमक और संतृप्त वसा वाले पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर वॉर्निंग लेबल लगाने को लेकर केंद्र सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के रुख पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने सवाल किया कि क्या खाद्य उद्योग से जुड़े बड़े कारोबारी समूहों के दबाव के कारण वॉर्निंग व्यवस्था लागू करने में हिचकिचाहट हो रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ कहा कि यदि संबंधित प्राधिकरण कदम नहीं उठाता तो न्यायालय खुद आदेश जारी कर सकता है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ कर रही थी। यह मामला एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें पैकेज्ड खाद्य पदार्थों में अधिक मात्रा में मौजूद चीनी, नमक और संतृप्त वसा को लेकर उपभोक्ताओं को स्पष्ट वॉर्निंग देने की मांग की गई है। अदालत इससे पहले भी एफएसएसएआई से जनस्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए ऐसे लेबल पर विचार करने को कह चुकी है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने एफएसएसएआई की 7 मार्च को हुई बैठक के कार्यवृत्त का हवाला दिया। उनका कहना था कि बैठक में लिए गए फैसले अदालत के पहले के निर्देशों के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने बताया कि खाद्य उद्योग द्वारा वॉर्निंग लेबल का विरोध किए जाने के बाद एफएसएसएआई ने पैकेट पर अतिरिक्त चीनी, संतृप्त वसा और नमक की दैनिक आवश्यकता से जुड़ी जानकारी देने का सुझाव दिया है।
अदालत के सामने यह भी कहा गया कि एफएसएसएआई के हलफनामे में खाद्य उद्योग की आपत्तियों का उल्लेख किया गया, लेकिन अधिक चीनी, नमक और संतृप्त वसा वाले खाद्य पदार्थों के सेवन को कम करने में वॉर्निंग लेबल की उपयोगिता से जुड़े नागरिक समाज के सुझावों और साक्ष्यों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
इस पर पीठ ने सवाल उठाया कि क्या एफएसएसएआई खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियों के दबाव में काम कर रहा है। अदालत ने कहा कि यह पूरा विषय जनस्वास्थ्य और बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ा है और ऐसे मामलों में व्यावसायिक हितों का प्रभाव नहीं होना चाहिए।
पीठ ने यह भी पूछा कि यदि वॉर्निंग लेबल लागू करने को लेकर कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है तो अदालत के पहले के निर्देशों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह यह पहल अपने लिए नहीं, बल्कि आम लोगों के हित में कर रहा है।
अदालत ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया कि वॉर्निंग व्यवस्था लागू होने पर नमकीन जैसे कई पारंपरिक खाद्य पदार्थों पर भी अधिक वसा, चीनी या नमक का उल्लेख करना पड़ेगा। पीठ ने सवाल किया कि क्या देश के लोगों, खासकर बढ़ते बच्चों, को स्वस्थ रखना प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए।















