पुणे, 13 अगस्त।
पुणे की चार साल की मासूम बच्ची के साथ जो हुआ, उसने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता को नंगा कर दिया है। सात आवारा कुत्तों के झुंड ने बच्ची पर हमला किया और उसे नोच-नोचकर जख्मी कर दिया। बच्ची के सिर पर 80 टांके आए हैं और उसकी हालत गंभीर बनी हुई है। यह घटना रविवार को एक रिहायशी इलाके में हुई, जहां लोग रोजाना इसी डर में जीते हैं कि कब आवारा कुत्तों का झुंड उनके बच्चों पर टूट पड़े। लोग चिल्लाते रहे, बचाने की कोशिश करते रहे, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
यह सब सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बाद हो रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार कहा है कि शहरों में आवारा कुत्तों के लिए शेल्टर होम बनाए जाएं, उन्हें पकड़कर नसबंदी की जाए और टीकाकरण किया जाए, ताकि मानव और जानवर दोनों सुरक्षित रहें। कोर्ट ने नगर निगमों और राज्य सरकारों को समय पर फटकार भी लगाई है और रिपोर्ट तलब की है। लेकिन हकीकत यह है कि कागजों पर सब कुछ तैयार है और जमीन पर कुछ भी नहीं।
प्रशासन कोर्ट में हलफनामा देता है कि शेल्टर होम बनाए जा रहे हैं, नसबंदी अभियान चल रहा है और कुत्तों को टीका लगाया जा रहा है। लेकिन जब कोई बच्चा कुत्तों का शिकार बनता है तो वही प्रशासन आंख बंद कर लेता है या फिर बयान दे देता है कि जांच की जाएगी। पुणे की घटना के बाद भी नगर निगम के अधिकारियों ने कहा कि वे मामले को गंभीरता से ले रहे हैं, लेकिन पिछले तीन साल में कितने शेल्टर होम बने, कितने कुत्तों की नसबंदी हुई, इसका कोई हिसाब नहीं है।
यह सिर्फ पुणे की कहानी नहीं है। देश के लगभग हर बड़े शहर में यही हाल है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, लखनऊ और छोटे शहरों में भी आवारा कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सुबह स्कूल जाने वाले बच्चे, पार्क में खेलने वाले लोग और बुजुर्ग, जो टहलने निकलते हैं, सभी को डर लगता है। कुत्तों के झुंड सड़कों, कूड़ेदानों और खाली प्लॉटों पर कब्जा जमाए बैठे हैं और जैसे ही उन्हें मौका मिलता है, वे हमला कर देते हैं।
इधर जम्मू के राजौरी जिले में भी ऐसी ही एक घटना ने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया है। यहां आवारा कुत्तों के हमले के डर से प्रशासन ने दो दर्जन स्कूलों को बंद करने का आदेश दे दिया है। निजी और सरकारी दोनों स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को खतरा बताया गया है। सोचिए, किस हद तक हालात बिगड़ चुके हैं कि बच्चों की पढ़ाई रोकनी पड़ रही है, सिर्फ इसलिए क्योंकि प्रशासन कुत्तों को काबू में नहीं कर पा रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में हर साल हजारों लोग कुत्ते के काटने से रेबीज का शिकार होते हैं और सैकड़ों की मौत हो जाती है। लेकिन इसके बावजूद नगर निगमों की प्राथमिकता में यह मुद्दा सबसे नीचे है। फंड आता है, टेंडर निकलते हैं, लेकिन शेल्टर होम नहीं बनते। नसबंदी के नाम पर खानापूर्ति होती है और टीकाकरण अभियान कागजों तक सीमित रह जाता है।
जवाबदेही का सवाल सबसे बड़ा है। कोर्ट को गलत जानकारी कौन दे रहा है? क्या प्रशासन जानबूझकर आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है या फिर वाकई में काम हो रहा है, लेकिन उसकी निगरानी नहीं हो रही है? दोनों ही स्थिति में दोषी कौन है? नगर निगम के अधिकारी, पशु कल्याण विभाग या फिर वह राजनीतिक नेतृत्व, जो इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लेता?
पशु प्रेमियों और प्रशासन के बीच की खींचतान भी इस समस्या को और बढ़ा रही है। एक तरफ लोग कहते हैं कि कुत्तों को मारना नहीं चाहिए, दूसरी तरफ आम आदमी कहता है कि पहले इंसान की जान बचाओ। दोनों पक्षों की बात अपनी जगह सही है, लेकिन बीच का रास्ता यही है कि कोर्ट के आदेश के अनुसार वैज्ञानिक तरीके से नसबंदी, टीकाकरण और शेल्टर होम बनाए जाएं। लेकिन यह काम कौन करेगा? जब तक फंड का दुरुपयोग होता रहेगा और अधिकारी फाइलों में उलझे रहेंगे, तब तक कुत्ते भी बढ़ते रहेंगे और हादसे भी होते रहेंगे।
पुणे की बच्ची के पिता का कहना है कि उन्होंने कई बार नगर निगम में शिकायत की थी कि उनके इलाके में कुत्तों का झुंड रहता है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। घटना के दिन भी कुत्ते गली में घूम रहे थे और किसी ने ध्यान नहीं दिया। अब सवाल यह है कि अगर शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं होती तो फिर शिकायत तंत्र का क्या फायदा?
राजौरी में स्कूल बंद करने का फैसला प्रशासन की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत है। इसका मतलब है कि प्रशासन ने हार मान ली है। वह कुत्तों को नियंत्रित नहीं कर सकता, इसलिए बच्चों को घर बैठा दो। यह कैसी व्यवस्था है, जहां इंसानों को अपनी सुविधा छोड़नी पड़ रही है, ताकि जानवरों को खुला छोड़ा जा सके?
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सख्त रुख अपनाए। उन अधिकारियों पर कार्रवाई हो, जो झूठे हलफनामे दे रहे हैं। हर शहर में समय सीमा तय करके शेल्टर होम बनाए जाएं। नसबंदी और टीकाकरण का ऑडिट हो और हर महीने रिपोर्ट कोर्ट में पेश हो। साथ ही आम जनता को भी जागरूक करना होगा कि वे कूड़ा खुले में न फेंकें, क्योंकि कूड़े के ढेर ही कुत्तों को आकर्षित करते हैं।
पुणे की बच्ची के 80 टांके और राजौरी के बंद स्कूल हमें आईना दिखा रहे हैं। यह आईना प्रशासन की लापरवाही का है। यह आईना उस व्यवस्था का है, जो कोर्ट के आदेश को भी मजाक समझती है और यह आईना हम सबका भी है, क्योंकि जब तक हम सवाल नहीं पूछेंगे, तब तक जिम्मेदार लोग जिम्मेदारी नहीं लेंगे।
अगर अब भी आंखें नहीं खुलीं तो अगली खबर किसी और शहर की किसी और मासूम की होगी और तब भी हम यही पूछते रह जाएंगे कि जिम्मेदार कौन है? इसलिए अब भाषण नहीं, काम चाहिए। अब फाइल नहीं, शेल्टर होम चाहिए और अब वादे नहीं, सुरक्षा चाहिए। क्योंकि हर बच्चे को सड़क पर सुरक्षित चलने का अधिकार है और उस अधिकार की रक्षा करना सरकार और प्रशासन दोनों का कर्तव्य है।















