देश के स्कूलों में अब पिज्जा, बर्गर, चिप्स और कोल्ड ड्रिंक का दौर खत्म होने जा रहा है। केंद्र सरकार ने बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है। इसी शिक्षा सत्र से देश के सभी सरकारी, निजी और अर्द्धसरकारी स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले खाने में कैलोरी और शुगर की मात्रा तय की जाएगी। स्कूल की कैंटीन, कैफे और मेस में हाई कैलोरी और हाई शुगर वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री पर रोक लगेगी। यह नियम स्कूल गेट से 50 मीटर के दायरे तक भी लागू होगा, ताकि बाहर ठेले और दुकानों से भी बच्चे जंक फूड न खरीद सकें।
इस फैसले के पीछे की वजह बेहद गंभीर है। देश में बच्चों में मोटापा और डायबिटीज तेजी से बढ़ रही है। आंकड़े डराने वाले हैं। देश में 4.1 करोड़ बच्चे ओवरवेट या मोटापे का शिकार हैं। 6 से 19 साल की उम्र के बच्चों में 10 प्रतिशत बच्चे प्री-डायबिटीज की चपेट में हैं और 15 से 19 साल के किशोरों में यह आंकड़ा 23 प्रतिशत तक पहुंच गया है। पहले माना जाता था कि मोटापा और शुगर बड़ों की बीमारी है, लेकिन अब छोटे बच्चे भी इसका शिकार हो रहे हैं। इसका सीधा संबंध उनके खान-पान और जीवनशैली से है। सरकार ने पहली बार इस समस्या को जड़ से पकड़ने की कोशिश की है।
फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ने 2020 में ‘सेफ फूड एंड बैलेंस्ड डाइट्स फॉर चिल्ड्रन इन स्कूल’ नाम से रेगुलेशन तो बनाए थे, लेकिन उसमें सिर्फ यह कहा गया था कि हाई कैलोरी और हाई शुगर वाला खाना नहीं दिया जाएगा। लेकिन कितना हाई है, इसकी कोई मात्रा तय नहीं थी। इसी वजह से स्कूल और कंपनियां बच निकलते थे। अब सरकार ने प्रति 100 ग्राम के हिसाब से ठोस और तरल पदार्थों के लिए स्पष्ट मात्रा तय कर दी है। ठोस पदार्थ में 4.2 ग्राम कैलोरी, 3.0 ग्राम शुगर और 0.625 ग्राम नमक की सीमा रखी गई है, वहीं तरल पदार्थ में 1.5 ग्राम कैलोरी, 2.0 ग्राम शुगर और 0.175 ग्राम नमक से ज्यादा नहीं होगा।
इस नियम के दायरे में देश के 24.69 करोड़ बच्चे आएंगे। यह संख्या अपने आप में बताती है कि यह फैसला कितना बड़ा है। अब मिड-डे मील से लेकर प्राइवेट स्कूलों की महंगी कैंटीन तक सभी को इन नियमों का पालन करना होगा। अगर कोई स्कूल या वेंडर इसका उल्लंघन करता है तो उस पर सामान्य खाद्य सुरक्षा कानूनों के तहत कार्रवाई होगी। लेकिन इस बार फर्क यह है कि मात्रा तय होने की वजह से कार्रवाई करना आसान हो जाएगा। पहले अधिकारी कहते थे कि यह हाई शुगर है, लेकिन सबूत नहीं था। अब लैब टेस्ट में अगर सीमा से ज्यादा निकला तो सीधे कार्रवाई होगी।
इस फैसले का सबसे बड़ा असर स्कूलों की कैंटीन पर पड़ेगा। पिछले दो दशकों में स्कूल कैंटीन एक बड़ा बिजनेस बन गया है। मल्टीनेशनल कंपनियों ने स्कूलों के अंदर अपने ब्रांड की दुकानें खोल ली थीं। बच्चे लंच ब्रेक में पिज्जा, बर्गर, नूडल्स और कोल्ड ड्रिंक खरीदते थे। पैरेंट्स को लगता था कि महंगा खाना मतलब अच्छा खाना, लेकिन हकीकत यह थी कि एक पैकेट चिप्स और एक बोतल कोल्ड ड्रिंक में एक दिन की जरूरत से ज्यादा शुगर और नमक चला जाता था। अब इन चीजों पर रोक लगने से कैंटीन संचालकों को अपना मेन्यू बदलना होगा। उन्हें फल, सलाद, दूध, छाछ और घर जैसा खाना रखना होगा।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस फैसले को स्वागत योग्य कदम मान रहे हैं। उनका कहना है कि बचपन में पड़ने वाली आदतें जीवन भर साथ चलती हैं। अगर एक बच्चा 10 साल तक स्कूल में हेल्दी खाना खाएगा तो बड़े होकर भी वह जंक फूड से दूर रहेगा। इससे न सिर्फ मोटापा कम होगा, बल्कि हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर और टाइप-2 डायबिटीज जैसी बीमारियों का खतरा भी घटेगा। डब्ल्यूएचओ भी लगातार चेतावनी दे रहा है कि 2030 तक दुनिया में मोटापे की महामारी फैल जाएगी और भारत जैसे देश सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
लेकिन हर बड़े बदलाव के साथ चुनौतियां भी आती हैं। सबसे पहली चुनौती है निगरानी। देश में लाखों स्कूल हैं। क्या हर स्कूल की कैंटीन की जांच संभव होगी? क्या हर 100 ग्राम खाने का लैब टेस्ट कराया जाएगा? इसके लिए राज्य सरकारों को फूड सेफ्टी अधिकारियों की संख्या बढ़ानी होगी और स्कूल प्रबंधन को भी जिम्मेदार बनाना होगा। दूसरी चुनौती है जागरूकता। कई पैरेंट्स को लगता है कि बच्चा खुश है तो जो खाना चाहे, खाने दो। उन्हें समझाना होगा कि आज की थोड़ी-सी लापरवाही कल बड़े अस्पताल के बिल में बदल सकती है। तीसरी चुनौती है विकल्प देना। सिर्फ रोक लगाने से काम नहीं चलेगा। स्कूलों को सस्ता और स्वादिष्ट हेल्दी खाना उपलब्ध कराना होगा, वरना बच्चे बाहर से लाने लगेंगे।
कुछ लोग इसे माता-पिता के अधिकार में दखल भी बता सकते हैं, लेकिन यहां सवाल सिर्फ व्यक्तिगत पसंद का नहीं है। सवाल सार्वजनिक स्वास्थ्य का है। जब एक बच्चा बीमार होता है तो उसका इलाज परिवार के साथ-साथ सरकार और समाज भी करता है। इसलिए स्कूल जैसे सार्वजनिक स्थान पर न्यूनतम स्वास्थ्य मानक तय करना सरकार की जिम्मेदारी है।
इस नियम का एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि इससे घरेलू खाने को बढ़ावा मिलेगा। जब स्कूल में पिज्जा-बर्गर नहीं मिलेगा तो मां के हाथ का पराठा और सब्जी फिर से कूल लगने लगेगा। टिफिन कल्चर वापस आएगा और बच्चों को घर के खाने का स्वाद याद आएगा। इससे किसानों को भी फायदा होगा, क्योंकि स्कूलों में फल, सब्जी और दूध की मांग बढ़ेगी।
यह फैसला सिर्फ खाने तक सीमित नहीं है। यह देश के भविष्य की नींव रखने जैसा है। आज का बच्चा कल का नागरिक है। अगर वह स्वस्थ होगा तो देश स्वस्थ होगा। सरकार का यह कदम देर से आया, लेकिन सही दिशा में आया है। अब जरूरत है कि इसे कागजों से निकालकर जमीन पर लागू किया जाए। स्कूल प्रबंधन, शिक्षक, पैरेंट्स और छात्र सभी मिलकर इसे सफल बनाएं, क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग रहता है और स्वस्थ दिमाग ही देश को आगे ले जा सकता है।
अगर हम आज बच्चों की थाली से जंक फूड हटाकर पोषण रख देते हैं तो हम आने वाली पीढ़ी को बीमारियों से बचा देंगे। यह निवेश तुरंत दिखाई नहीं देगा, लेकिन 10 साल बाद जब ये बच्चे स्वस्थ होकर देश की जिम्मेदारी संभालेंगे, तब पता चलेगा कि हर निवाले की कैलोरी गिनने का फैसला कितना दूरदर्शी था।















