भोपाल में एक बड़े साहब के अधीनस्थ काम करने की पुरानी पहचान आखिर काम आ ही गई। राजधानी के सरदार बनने से पहले जब साहब नक्सल क्षेत्र में पदस्थ थे, तब उनके अधीन काम करने वाले एक साहब इन दिनों भोपाल में ही विराजमान हैं।
हाल ही में एक सम्मान समारोह में उन्हें ऐसा पुरस्कार मिल गया, जिसकी चर्चा इसलिए ज्यादा है कि जिस काम के लिए सम्मान मिला, वह काम उन्होंने किया ही नहीं। अब महकमे में कानाफूसी है कि उपलब्धि किसकी थी, यह पता नहीं, लेकिन सम्मान पाने की कला जरूर कमाल की है। सो चर्चा यही है- काम कोई और करे और सम्मान कोई और पाए, तो पुरानी पहचान किस काम की?















