नई दिल्ली, 17 अगस्त।
भारत की सामरिक स्थिति को देखते हुए अत्याधुनिक रक्षा तकनीक से लैस लड़ाकू विमानों की जरूरत लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। एक ओर चीन और दूसरी ओर पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के बीच भारत के लिए दो मोर्चों पर संभावित युद्ध की तैयारी बनाए रखना जरूरी है। इसी बीच रूस ने भारत के सामने पांचवीं पीढ़ी के एसयू-57ई लड़ाकू विमान की सीमित संख्या जल्द उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रखा है।
भारत ने हाल में फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है, लेकिन राफेल को चौथी या 4.5 पीढ़ी का विमान माना जाता है। दूसरी ओर चीन पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान विकसित कर चुका है और ऐसी खबरें सामने आई हैं कि वह इसे पाकिस्तान को भी दे सकता है। ऐसे हालात में भारत के लिए आधुनिक तकनीक से लैस पांचवीं पीढ़ी का विमान हासिल करना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
रूस की ओर से दिए गए प्रस्ताव में करीब 8 से 10 एसयू-57ई विमान शामिल हैं। इसके साथ लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली आर-77एम मिसाइल देने का विकल्प भी बताया गया है। यदि भारत इस प्रस्ताव को स्वीकार करता है तो स्वदेशी उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान के परिचालन में आने से पहले ही भारतीय वायुसेना को पांचवीं पीढ़ी की लड़ाकू क्षमता मिल सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, रूस ने एसयू-57ई की सीमित संख्या तेजी से उपलब्ध कराने की पेशकश की है। आठ से दस विमानों की संख्या वायुसेना की करीब आधी स्क्वाड्रन के बराबर होगी। इससे भारत को इस विमान के शुरुआती परिचालन अनुभव हासिल करने और उसकी क्षमताओं का आकलन करने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, इस प्रस्ताव पर भारत की ओर से अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।
रूस का उन्नत लड़ाकू विमान
एसयू-57 को रूस का सबसे उन्नत परिचालन लड़ाकू विमान माना जाता है। इसे पांचवीं पीढ़ी के विमानों की विशेषताओं को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। इसमें कम रडार दृश्यता, विमान के भीतर हथियार रखने की क्षमता, उन्नत सेंसर और नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता जैसी खूबियां शामिल हैं।
सीमित संख्या में इन विमानों को शामिल करने से भारतीय वायुसेना को पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के संचालन, रखरखाव और उपयोग का प्रत्यक्ष अनुभव मिल सकता है। प्रस्ताव में शामिल आर-77एम मिसाइल को इसका अहम हिस्सा माना जा रहा है। इसे इज्देलिये 180 के नाम से भी जाना जाता है और यह लंबी दूरी की सक्रिय रडार निर्देशित हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल है।
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों के अनुसार इसकी मारक क्षमता करीब 200 किलोमीटर तक बताई जाती है। इसमें सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक रूप से स्कैन किए गए एरे वाला साधक और दोहरी पल्स रॉकेट मोटर जैसी तकनीकें शामिल हैं। दोहरी पल्स मोटर को मिसाइल की उड़ान के अंतिम चरण में अतिरिक्त ऊर्जा देने के लिए तैयार किया गया है। इससे लंबी दूरी पर लक्ष्य की ओर बढ़ते समय मिसाइल की गति और गतिशीलता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
एसयू-57 की कम रडार दृश्यता और उसके उन्नत सेंसरों के साथ आर-77एम का संयोजन लंबी दूरी की हवाई लड़ाई में भारत को महत्वपूर्ण क्षमता दे सकता है।
अंतरिम समाधान बन सकता है विमान
हालांकि, सीमित संख्या में एसयू-57ई को शामिल करने के साथ कई चुनौतियां भी जुड़ी हैं। अलग लड़ाकू बेड़े के लिए पायलट प्रशिक्षण, रखरखाव, कलपुर्जे, हथियारों का भंडार और अलग रसद व्यवस्था तैयार करनी होगी।
इसके अलावा, भारत के स्वदेशी एएमसीए कार्यक्रम पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। एसयू-57 को एएमसीए के परिचालन में आने तक अंतरिम समाधान के तौर पर देखा जा सकता है। यदि एएमसीए कार्यक्रम में देरी होती है तो सीमित खरीद को आगे बढ़ाने का दबाव भी बन सकता है। इससे भारत की दीर्घकालिक पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की रणनीति प्रभावित होने की आशंका रहेगी।
भारत पहले से ही लंबी दूरी की स्वदेशी हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल क्षमता विकसित कर रहा है और अस्त्र मिसाइल परिवार के विभिन्न संस्करणों पर काम जारी है। ऐसे में आर-77एम तक तत्काल पहुंच भारतीय वायुसेना को अंतरिम बढ़त दे सकती है।















