कोलकाता, 18 अगस्त।
राजधानी के कलकत्ता उच्च न्यायालय में शिक्षकों की जनगणना ड्यूटी को लेकर चल रहे विवाद पर मंगलवार को लंबी जिरह हुई, लेकिन कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ सका। राज्य के इक्यास प्राथमिक शिक्षकों ने जनगणना कार्य को आधिकारिक तौर पर ड्यूटी का हिस्सा मानने की गुहार लगाते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया है, जिस पर न्यायमूर्ति कृष्णा राव की पीठ में सुनवाई चल रही है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य प्रशासन और जनगणना महकमे के बीच आपसी तालमेल की भारी कमी पर कड़ी आपत्ति जताई। न्यायधीश ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बाद यदि इन शिक्षकों पर किसी प्रकार की अनुशासनात्मक कार्रवाई या कारण बताओ नोटिस की नौबत आती है, तो इसकी जवाबदेही किसकी तय होगी। अदालत ने यह भी अहम सवाल उठाया कि जब तक अध्यापकों का विधिवत प्रशिक्षण ही संपन्न नहीं हुआ है, तब तक वे इस महत्वपूर्ण कार्य को कैसे पूरा करेंगे।
पीठ ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि एक तरफ तो विभाग ने गिनती के लिए केवल तीस दिनों का कड़ा वक्त तय किया है, तो दूसरी तरफ विद्यालयों में परीक्षाएं भी सिर पर आ चुकी हैं। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या संबंधित प्राधिकरण के पास यह पुख्ता आंकड़ा उपलब्ध है कि किस स्कूल में कुल कितने शिक्षक कार्यरत हैं और उनमें से कितने लोगों को इस कार्य में झोंक दिया गया है।
सरकार की तरफ से पक्ष रख रहे अधिवक्ता ने अदालत को अवगत कराया कि इस कार्य के लिए सुबह नौ से शाम चार बजे तक की अवधि तय की गई है। इस पर अदालत ने प्रतिप्रश्न किया कि क्या यह समयावधि इस बड़े पैमाने के कार्य को पूर्ण करने के लिए नाकाफी नहीं है। राज्य के प्रतिनिधियों ने उत्तर दिया कि अभी यही लक्ष्य निर्धारित है और जरूरत पड़ने पर समय बढ़ाया जा सकता है।
इसके बाद न्यायमूर्ति ने यह तीखा सवाल भी दागा कि यदि अध्यापकों की ड्यूटी लगाने से शिक्षण व्यवस्था चरमरा रही है, तो इस कार्य के लिए केवल शिक्षकों को ही क्यों चुना गया। उन्होंने सुझाव के तौर पर कहा कि इसके लिए स्थानीय निकायों, नगरपालिकाओं, पंचायतों और अन्य सरकारी दफ्तरों के लिपिक वर्ग की सेवाएं भी तो ली जा सकती थीं।
न्यायालय ने आगे यह भी पूछताछ की कि आखिर इस कार्य हेतु कुल कितने अध्यापकों को अधिकृत किया गया है और उन्हें प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी किसकी होगी। स्कूल परीक्षाओं की घोषणा के बीच शिक्षण दायित्वों और सर्वे के काम के बीच सामंजस्य बिठाने पर भी गंभीर सवाल उठाए गए।
शासकीय पक्ष की तरफ से कुछ और मोहलत मांगे जाने के बाद न्यायाधीश ने इस मामले की अगली सुनवाई कल यानी बुधवार तक के लिए स्थगित कर दी है, जिससे अब कल कोई व्यावहारिक फैसला आने की उम्मीद जताई जा रही है।















