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संपादकीय
18 Aug, 2026

जब रक्षक ही साइबर शिकारी बन जाएं

अमेरिका द्वारा साइबर अभियानों में निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ाने के फैसले ने जवाबदेही, गोपनीयता और वैश्विक साइबर सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

वाशिंगटन, 18 अगस्त।

अमेरिका ने साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में ऐसा कदम उठाया है, जिसकी सबसे ज्यादा आलोचना वह अब तक चीन और रूस पर करता रहा है। वाशिंगटन ने तय किया है कि अब अपनी साइबर सुरक्षा के लिए निजी कंपनियों और ठेकेदारों की मदद ली जाएगी। यानी विदेशी साइबर अपराधी संगठनों के खिलाफ साइबर कार्रवाई में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ेगी। कल तक जो अमेरिका दुनिया भर में हैकिंग को अनैतिक और गैरकानूनी बताता था, आज वही आक्रामक साइबर क्षमताओं के इस्तेमाल की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सरकार का तर्क है कि चीन और रूस वर्षों से साइबर हमलों का सहारा लेते रहे हैं, इसलिए अमेरिका को भी जवाबी हथियार चाहिए।

अब तक अमेरिका का आधिकारिक रुख यह था कि साइबर हमले अस्वीकार्य हैं और इंटरनेट को हथियार बनने से रोकना जरूरी है। लेकिन आज उसी अमेरिका ने मान लिया है कि साइबर युद्ध का मैदान पारंपरिक युद्ध से कम महत्वपूर्ण नहीं है। सवाल यह है कि जब रक्षक ही वही हथियार उठा ले, जिसे वह गलत बताता रहा है, तो दुनिया किसे सही मानेगी?

चीन और रूस पर आरोप लगाना आसान था, क्योंकि वे राज्य-प्रायोजित हैकिंग के लिए बदनाम रहे हैं। अमेरिका कहता था कि वहां की सरकारी एजेंसियां निजी हैकरों को संरक्षण देती हैं। अब अमेरिका भी निजी क्षेत्र को साइबर अभियानों में शामिल कर रहा है। अंतर सिर्फ इतना है कि नाम बदल गया है - भाड़े के शिकारी ठेकेदार बन बैठे हैं।

साइबर सुरक्षा में निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका कई जोखिम पैदा करती है। पहली बात जवाबदेही की है। अगर कोई निजी कंपनी गलती से किसी अस्पताल या स्कूल के सर्वर को निशाना बना देती है तो जिम्मेदार कौन होगा? दूसरी बात गोपनीयता की है। ठेकेदारों के पास सरकार का संवेदनशील डेटा होगा और उसके लीक होने का खतरा बना रहेगा। तीसरी बात नियंत्रण की है। एक बार जब ऐसी शक्ति निजी हाथों में चली गई तो उसे नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।

जब भी युद्ध का निजीकरण हुआ है, उसके दुरुपयोग के उदाहरण सामने आए हैं। ब्लैकवाटर जैसी कंपनियों ने इराक में जो किया, वह सबको याद है। अब वही मॉडल साइबर दुनिया में दोहराए जाने का खतरा है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां गोली नहीं, कोड चलेंगे।

अमेरिका के इस फैसले का असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। जब दुनिया की बड़ी ताकत विदेशी साइबर ढांचे के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई को उचित ठहराएगी तो दूसरे देश भी अपने तर्क देंगे। नतीजा यह हो सकता है कि इंटरनेट युद्ध का मैदान बन जाए, जहां सीमाएं और नियम कमजोर पड़ जाएं।

भारत के लिए यह घटनाक्रम गंभीर है। हमारा बैंकिंग तंत्र, अस्पताल, रेल और बिजली ग्रिड तेजी से डिजिटल हो रहे हैं। ऐसे में भारत को अपनी साइबर ढाल मजबूत करनी होगी और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर साइबर युद्ध के बढ़ते खतरे का विरोध करना होगा।

साइबर सुरक्षा का मतलब सिर्फ हमला करना नहीं, बचाव, डेटा की सुरक्षा और आम नागरिक के अधिकारों की रक्षा भी है। दुनिया को साइबर हथियारों की दौड़ नहीं, साइबर शांति की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र के तहत बाध्यकारी समझौता होना चाहिए, जिसमें नागरिक ढांचे पर साइबर हमले को गंभीर अपराध माना जाए।

अमेरिका ने दरवाजा खोल दिया है। अब देखना यह है कि वह इस रास्ते से सुरक्षा की ओर जाता है या विनाश की ओर। अगर रक्षक ही शिकारी बन गया तो फिर दुनिया किससे अपनी रक्षा मांगेगी?

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व्ययाधिक्य का अवसर आ सकता है। लाभदायक कार्यों की चेष्टाएं प्रबल होंगी। बुद्घितत्व की सक्रियता से अल्प लाभ का हर्ष होगा। कुछ महत्वपूर्ण कार्य बनाने के लिए भाग-दौड़ रहेगी। लाभकारी गतिविधियों में सक्रियता रहेगी। रुका हुआ लाभ आज प्राप्त हो सकता है। धार्मिक स्थलों की यात्रा का योग। शुभांक-4-6-8

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