भोपाल, 19 अगस्त।
भोपाल शहर अब पुराने नक्शे से नहीं चल सकता। राजधानी की आबादी बढ़ रही है, ट्रैफिक बढ़ रहा है और लोगों की जरूरतें भी बदल रही हैं। इसी बदलाव को ध्यान में रखकर मास्टर प्लान 2031 में एक बड़ा फैसला लिया गया है। अब भोपाल में हर साल 12 हेक्टेयर अतिरिक्त व्यावसायिक जमीन की जरूरत होगी। यानी हर साल जमीन का कुछ हिस्सा दुकानों, ऑफिसों और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए आरक्षित करना पड़ेगा। 1991 के मास्टर प्लान में यह आंकड़ा 65 हेक्टेयर था, जो 2018 में बढ़कर 405 हेक्टेयर हो गया और अब 2031 तक इसे 5081 हेक्टेयर तक ले जाने की तैयारी है।
यह आंकड़ा शहर की बदलती हकीकत को दिखाता है। पहले भोपाल को झीलों और हरियाली का शहर कहा जाता था, लेकिन अब यह तेजी से बढ़ता व्यावसायिक केंद्र बन रहा है। आईटी पार्क, मॉल, मल्टीप्लेक्स और कॉरपोरेट ऑफिस शहर के हर कोने में नजर आ रहे हैं। पुराने इलाकों में भी व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ रही हैं।
भोपाल की आबादी पिछले 30 साल में कई गुना बढ़ी है। 1991 में जो शहर 12 लाख की आबादी के लिए बना था, वह अब 25 लाख से ज्यादा लोगों का घर है। आबादी के साथ रोजगार, बाजार और सेवाओं की जरूरत भी बढ़ी है। पहले लोग काम के लिए एक इलाके से दूसरे इलाके जाते थे। अब ट्रैफिक और समय की बचत के लिए लोग चाहते हैं कि दुकान, ऑफिस और स्कूल उनके घर के पास ही हों। इसी कारण रिहायशी इलाकों में भी व्यावसायिक उपयोग बढ़ गया है। एमपी नगर, न्यू मार्केट और 10 नंबर जैसी जगहें पहले ही कमर्शियल हो चुकी हैं। अब कोलार, अरेरा हिल्स और होशंगाबाद रोड पर भी यही ट्रेंड दिख रहा है।
नए मास्टर प्लान के अनुसार भोपाल में 2031 तक 5081 हेक्टेयर जमीन व्यावसायिक उपयोग के लिए चाहिए होगी। इसमें हर साल 12 हेक्टेयर की अतिरिक्त मांग जोड़ी गई है। इसका मतलब है कि शहर को अब वर्टिकल विस्तार करना होगा। जमीन सीमित है, इसलिए ऊंची इमारतें और मिक्स्ड यूज कॉम्प्लेक्स बनाने होंगे।
प्लान में यह भी कहा गया है कि शहर के कोर एरिया में अब नई व्यावसायिक जमीन नहीं मिलेगी। इसलिए विकास को बाहरी हिस्सों की ओर ले जाना होगा। कोलार रोड, अरेरा हिल्स, होशंगाबाद रोड और बैरागढ़ में नए कमर्शियल हब विकसित किए जाएंगे।
व्यावसायिक जमीन बढ़ने से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। नए ऑफिस, शोरूम और मॉल खुलेंगे तो युवाओं को नौकरी मिलेगी, शहर की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और राजस्व भी बढ़ेगा।
लेकिन चुनौतियां कम नहीं हैं। सबसे पहली चुनौती ट्रैफिक की है। अगर हर कॉलोनी में दुकानें खुलेंगी और सड़कों पर पार्किंग नहीं होगी तो जाम लगना तय है। दूसरी चुनौती पार्किंग और बुनियादी सुविधाओं की है। पानी, बिजली और सीवेज का लोड पहले से ज्यादा है। तीसरी चुनौती हरित क्षेत्र की है। खुले स्थान कम हुए तो भोपाल की पहचान प्रभावित होगी।
यदि बिना नियम के हर घर के नीचे दुकान खोल दी गई तो कॉलोनियां बाजार में बदल जाएंगी और रहने लायक नहीं रहेंगी। इसलिए मिक्स्ड लैंड यूज की नीति स्पष्ट होनी चाहिए कि कहां कितना व्यावसायिक उपयोग हो सकता है।
व्यापारी वर्ग इस फैसले से खुश है। उनका कहना है कि शहर बढ़ रहा है तो कारोबार के अवसर भी बढ़ने चाहिए। लेकिन आम नागरिक चिंतित हैं। उन्हें डर है कि उनके घर के सामने मॉल और ऑफिस बनने से शांति भंग होगी।
सबसे पहले जरूरी है कि मास्टर प्लान को सख्ती से लागू किया जाए। केवल कागज पर प्लान बनाकर छोड़ देने से काम नहीं चलेगा। नगर निगम और विकास प्राधिकरण को मिलकर तय करना होगा कि कौन से क्षेत्र पूरी तरह कमर्शियल होंगे, कौन से मिक्स्ड होंगे और कौन से पूरी तरह रिहायशी रहेंगे। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना होगा। अगर मेट्रो और बसें बेहतर होंगी तो लोग निजी वाहन कम इस्तेमाल करेंगे और ट्रैफिक का दबाव घटेगा। हर नए व्यावसायिक प्रोजेक्ट में पर्याप्त पार्किंग और पेड़ लगाना अनिवार्य किया जाए।
भोपाल अब 1991 वाला भोपाल नहीं रहा है। हर साल 12 हेक्टेयर व्यावसायिक जमीन बढ़ाने का फैसला संकेत है कि भोपाल अब केवल प्रशासनिक राजधानी नहीं रहेगा, बल्कि बड़ा आर्थिक और व्यावसायिक केंद्र बनेगा।
लेकिन यह विकास तभी टिकाऊ होगा, जब नियोजित होगा। यदि बिना प्लानिंग के विकास हुआ तो भोपाल की झीलें सिकुड़ेंगी, सड़कें जाम होंगी और रहने की गुणवत्ता गिरेगी। इसलिए सरकार, प्रशासन और जनता को मिलकर सुनिश्चित करना होगा कि विकास हो, लेकिन भोपाल की आत्मा बची रहे। फैसला अब मास्टर प्लान के कागजों से निकलकर जमीन पर लागू होने का है।















