भोपाल, 19 अगस्त।
पिछले एक दशक में मोबाइल ने जिंदगी आसान की, लेकिन अब वही मानसिक थकान का कारण बन गया है। लगातार नोटिफिकेशन, रील्स और ऑनलाइन तुलना के दबाव ने जेन जी यानी 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई पीढ़ी को प्रभावित किया है। मनोचिकित्सक इसे नोमोफोबिया और डिजिटल बर्नआउट कहते हैं। नींद कम होना और अकेलापन इसके लक्षण हैं।
सबसे बड़ा बदलाव सिनेमा को लेकर दिख रहा है। जेन जी फिर से थिएटर जा रही है। मोबाइल पर अकेले कंटेंट देखने से ऊबे युवा अब दोस्तों के साथ बाहर निकलना चाहते हैं। डार्क हॉल, बड़ी स्क्रीन और बिना रुकावट का अनुभव उन्हें डिजिटल दुनिया से कुछ घंटे की राहत देता है। फिल्म देखना अब केवल मनोरंजन नहीं, सोशल गैदरिंग भी बन गया है।
फिल्मों के साथ जेन जी खेल और फिजिकल एक्टिविटी की तरफ भी लौट रही है। कॉलेज कैंपस में बैडमिंटन, फुटबॉल और रनिंग क्लब की सदस्यता बढ़ी है। जिम में ग्रुप वर्कआउट और आउटडोर स्पोर्ट्स का क्रेज बढ़ा है। कारण है - स्क्रीन टाइम कम करके मानसिक स्वास्थ्य बेहतर करना और असली दुनिया में दोस्त बनाना।
जेन जी का यह बदलाव पूर्ण बहिष्कार नहीं, बल्कि संतुलन की कोशिश है। वे मोबाइल छोड़ नहीं रहे, बल्कि उसे सीमित कर रहे हैं। कुछ वीकेंड पर डिजिटल डिटॉक्स करते हैं और कुछ कंटेंट को चुनकर देखते हैं। यह पीढ़ी समझ गई है कि लगातार स्क्रॉल करने से थकान मिलती है। इसलिए वे फिल्में, किताबें, संगीत और खेल चुन रही हैं।
जेन जी का यह कदम संकेत है कि तकनीक के साथ जीना है, लेकिन तकनीक का गुलाम नहीं बनना है। मोबाइल से ऊबकर वे दोबारा असली दुनिया की तरफ लौट रहे हैं। थिएटर की भीड़, स्टेडियम की आवाज और दोस्तों के साथ हंसी अब उन्हें ज्यादा सुकून दे रही है। अगली पीढ़ी डिजिटल और फिजिकल दोनों दुनिया में संतुलन चाहती है।














