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संपादकीय
20 Aug, 2026

2005 का मास्टर प्लान फाइलों में बंद, भोपाल का बदलाव अधूरा

भोपाल के 2005 के मास्टर प्लान में प्रस्तावित बाजारों की शिफ्टिंग और व्यवस्थित विकास अब तक अधूरा रहने से शहर जाम, पार्किंग, अवैध कब्जों और अव्यवस्था जैसी समस्याओं से जूझ रहा है।

भोपाल, 20 अगस्त।

भोपाल शहर के विकास का खाका 2005 में तैयार किया गया था। उस समय तय हुआ था कि शहर के व्यावसायिक और भीड़भाड़ वाले इलाकों को नए सिरे से विकसित किया जाएगा, लेकिन 31 साल बीत जाने के बाद भी वह खाका केवल कागजों में ही सिमटा हुआ है। हबीबगंज रोड, भारत टॉकीज के पास आईएस फैक्ट्री, रायसेन रोड और भोपाल के ऐसे कई क्षेत्र थे, जिन्हें व्यावसायिक गतिविधियों से मुक्त कर नए सिरे से बसाने का प्रस्ताव था, लेकिन आज भी वही पुरानी भीड़, वही जाम और वही अव्यवस्था नजर आ रही है।

1995 में जब पहली बार शिफ्टिंग का प्लान बना था, तब लगा था कि अब शहर को नई दिशा मिलेगी, लेकिन न तो प्रशासन ने गंभीरता दिखाई और न ही व्यापारी वर्ग इसके लिए तैयार हुआ। नतीजा यह हुआ कि 2005 का मास्टर प्लान भी फाइलों की धूल खाता रह गया।

2005 के मास्टर प्लान में भोपाल के पुराने और घने बसे इलाकों को राहत देने के लिए कई बड़े फैसले लिए गए थे। हबीबगंज रोड को व्यावसायिक हब से हटाकर आवासीय क्षेत्र बनाना था। भारत टॉकीज के पास स्थित आईएस फैक्ट्री की जमीन को मुक्त कर वहां पार्क और सार्वजनिक सुविधाएं विकसित करनी थीं। रायसेन रोड पर चल रहे अनियोजित व्यापार को व्यवस्थित कर नए व्यावसायिक क्षेत्र बनाने थे। इसके अलावा पुराने शहर के बाजारों को बाहर शिफ्ट करना और नए बस स्टैंड तथा व्यापारिक केंद्र विकसित करना था। योजना यह थी कि शहर का विस्तार व्यवस्थित तरीके से हो और पुराने इलाकों पर दबाव कम हो।

सबसे बड़ा कारण रहा प्रशासनिक उदासीनता। प्लान बनने के बाद उसे जमीन पर उतारने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। दूसरी बड़ी बाधा बनी व्यापारी वर्ग की नाराजगी। व्यापारियों का कहना था कि पुराने बाजारों को हटाने से उनका रोजगार प्रभावित होगा और ग्राहक नए स्थानों तक नहीं पहुंच पाएंगे।

जमीन की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती थी। नए व्यावसायिक क्षेत्र विकसित करने के लिए जमीन अधिग्रहण की जरूरत थी, लेकिन इस प्रक्रिया में देरी और विवादों के कारण काम शुरू ही नहीं हो सका। नतीजा यह हुआ कि जो इलाके 2005 में खाली कराए जाने थे, वे आज भी उतने ही घने और भीड़भाड़ वाले हैं।

मास्टर प्लान के अधूरे रहने से भोपाल को हर स्तर पर नुकसान उठाना पड़ रहा है। ट्रैफिक की समस्या लगातार बढ़ रही है, पुराने बाजारों में पार्किंग की जगह नहीं है और आपातकाल में दमकल और एंबुलेंस तक नहीं पहुंच पातीं। हबीबगंज रोड पर दिनभर जाम लगता है और पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है। भारत टॉकीज के पास फैक्ट्री की जमीन पर आज भी कब्जे हैं और वह जगह अवैध गतिविधियों का अड्डा बन गई है। रायसेन रोड पर अनियोजित निर्माण के कारण सीवेज और पानी की समस्या बढ़ गई है। अगर समय पर प्लान लागू होता तो आज भोपाल का चेहरा कुछ और होता।

स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारें आती-जाती हैं, लेकिन मास्टर प्लान पर कोई काम नहीं करता। हर बार चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे होते हैं, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं होता। व्यापारी वर्ग भी दोराहे पर है। वे जानते हैं कि पुराने बाजारों में अब विस्तार की गुंजाइश नहीं है, लेकिन नए स्थान पर जाने का भरोसा भी नहीं है। युवा वर्ग का मानना है कि भोपाल को अब आधुनिक शहर की तरह विकसित करना होगा, नहीं तो यह शहर अपनी पहचान खो देगा। भीड़भाड़ और अव्यवस्था के कारण नए निवेशक भी भोपाल आने से कतराते हैं।

2005 का प्लान भले ही पुराना हो गया हो, लेकिन उसकी मूल भावना आज भी प्रासंगिक है। जरूरत है कि उसे नए सिरे से अपडेट कर लागू किया जाए। इसके लिए प्रशासन और व्यापारियों के बीच संवाद स्थापित कर उन्हें विश्वास में लेना होगा। नए व्यावसायिक क्षेत्रों के लिए बुनियादी सुविधाएं पहले से तैयार करनी होंगी, ताकि लोग शिफ्ट होने के लिए तैयार हों। साथ ही कड़े कानून बनाकर अवैध कब्जों और अनियोजित निर्माण पर रोक लगानी होगी।

मध्यप्रदेश सरकार और भोपाल नगर निगम को अब इस मुद्दे को गंभीरता से लेना होगा। स्मार्ट सिटी मिशन के तहत भोपाल को विकसित करने की बात होती है, लेकिन जब तक पुराने शहर को व्यवस्थित नहीं किया जाएगा, तब तक स्मार्ट सिटी का सपना अधूरा रहेगा।

मास्टर प्लान केवल कागज का दस्तावेज नहीं होता, वह शहर के भविष्य का रोडमैप होता है। अगर उसे लागू नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों को भी आज जैसी ही समस्याओं से जूझना पड़ेगा। भोपाल का 2005 मास्टर प्लान इस बात का उदाहरण है कि अच्छी योजना भी बिना इच्छाशक्ति के बेकार हो जाती है। 31 साल पहले जो समस्या छोटी थी, वह अब विकराल रूप ले चुकी है। अब भी देर नहीं हुई है। अगर सरकार, प्रशासन और जनता मिलकर संकल्प लें तो भोपाल को नई पहचान दी जा सकती है।

शहर को जाम मुक्त करना है तो भीड़भाड़ वाले इलाकों को व्यवस्थित करना होगा, व्यापार को बढ़ाना है तो नए व्यावसायिक हब बनाने होंगे और नागरिकों को बेहतर जीवन देना है तो मास्टर प्लान को फाइलों से निकालकर जमीन पर उतारना होगा। भोपाल हृदय प्रदेश की राजधानी है। इसकी पहचान झीलों और हरियाली से है, लेकिन अब समय आ गया है कि इस पहचान में व्यवस्थित विकास भी जुड़े, अन्यथा 2031 का अगला मास्टर प्लान भी 2005 की तरह केवल इतिहास बनकर रह जाएगा।

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