वाशिंगटन, 20 अगस्त।
वाशिंगटन से निकली एक खबर ने पूरे पश्चिम एशिया को फिर से हिला कर रख दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एक इंटरव्यू में ओमान को सीधी धमकी दी है। ट्रंप ने कहा कि अगर ओमान होर्मुज जलमार्ग के संचालन को लेकर ईरान के साथ किसी समझौते के बीच में आया तो अमेरिका उस पर जबरदस्त बमबारी करेगा। यह बयान ऐसे समय आया है, जब ईरान और ओमान के बीच जलमार्ग के संचालन को लेकर बातचीत चल रही थी। अमेरिका को लगता है कि यह समझौता उसकी क्षेत्रीय रणनीति के खिलाफ है, इसलिए उसने ओमान को निशाना बनाना शुरू कर दिया है।
ट्रंप ने आगे कहा कि ईरान को आत्मसमर्पण का सफेद झंडा लहराना चाहिए। उनके अनुसार, अमेरिका के पास कोई समय सीमा नहीं है और न ही उन्हें कोई जल्दी है। उनका मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि ईरान के पास कभी भी परमाणु हथियार न पहुंचे। ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि मध्यावधि चुनावों से उनकी इस नीति का कोई लेना-देना नहीं है।
ट्रंप की धमकी के जवाब में ईरान भी पीछे नहीं हटा। ईरानी सेना के आर्मी चीफ अमीर हातमी ने घोषणा की है कि जो भी अमेरिकी सैनिक को मारेगा या पकड़ेगा, उसे ईरान की तरफ से 30 हजार डॉलर का इनाम दिया जाएगा और अगर यह काम कोई महिला करती है तो इनाम की राशि दोगुनी कर दी जाएगी। यह बयान सीधे तौर पर अमेरिका को उकसाने वाला माना जा रहा है और इससे दोनों देशों के बीच तनाव और गहरा गया है।
ईरान का यह कदम अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ माना जा रहा है, लेकिन तेहरान इसे अपने आत्मसम्मान और संप्रभुता की रक्षा के रूप में देख रहा है। ईरानी मीडिया में इस घोषणा को देशभक्ति से जोड़कर पेश किया जा रहा है और जनता में इसका जबरदस्त समर्थन भी मिल रहा है।
होर्मुज जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है। ओमान और ईरान दोनों इस जलमार्ग के किनारे स्थित हैं और दोनों का इस पर नियंत्रण है। पिछले कुछ महीनों से खबरें थीं कि ईरान और ओमान मिलकर इस जलमार्ग के संचालन के लिए एक नया तंत्र बनाने वाले हैं। अमेरिका को डर है कि अगर ऐसा हुआ तो ईरान इस रास्ते का इस्तेमाल अपने हित में करेगा और अमेरिकी नौसेना की गतिविधियों पर असर पड़ेगा।
इसी डर के कारण ट्रंप प्रशासन ने ओमान पर दबाव बनाना शुरू किया और जब बात नहीं बनी तो सीधी धमकी दे दी। विशेषज्ञ मानते हैं कि होर्मुज जलमार्ग को लेकर टकराव आने वाले समय में और बढ़ सकता है, क्योंकि यहां से तेल की आपूर्ति रुकने का मतलब होगा वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा असर।
इसी बीच गाजा में रुकी हुई शांति प्रक्रिया को फिर से शुरू करने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर, पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर और संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारी निकोले म्लाडेनोव ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मुलाकात की। इस दल ने इजिप्ट में हमास के प्रमुख से भी बातचीत की, ताकि युद्धविराम और राहत सामग्री की आपूर्ति पर सहमति बन सके।
लेकिन जमीनी हालात अभी भी तनावपूर्ण हैं। इजरायल के सुरक्षा मंत्री इतामार बेन ग्विर ने विवादास्पद बयान देते हुए कहा कि गाजा में हर रात 30 से 40 लोगों को निशाना बनाना चाहिए। इस बयान के बाद फिलिस्तीनी पक्ष ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि इस तरह की सोच शांति प्रक्रिया को पूरी तरह खत्म कर देगी।
पश्चिम एशिया का संकट सिर्फ ईरान और इजरायल तक सीमित नहीं है। यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के एक सैन्य जहाज पर हमला किया है। इस हमले में जहाज को नुकसान पहुंचा है और कई सैनिकों के हताहत होने की खबर है। सऊदी अरब ने इस हमले की कड़ी निंदा की है और कहा है कि इसका मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।
हूती लगातार लाल सागर और अदन की खाड़ी में जहाजों को निशाना बना रहे हैं। उनका कहना है कि ये हमले गाजा में हो रही बमबारी के विरोध में किए जा रहे हैं। लेकिन सऊदी और अमेरिका इसे ईरान की शह पर हो रही आतंकवादी गतिविधि मानते हैं।
ट्रंप प्रशासन एक साथ कई मोर्चों पर काम कर रहा है। एक तरफ वह ईरान पर अधिकतम दबाव की नीति अपना रहा है, तो दूसरी तरफ वह इजरायल के जरिए गाजा में शांति की बात भी कर रहा है। लेकिन दोनों नीतियों में तालमेल की कमी साफ दिख रही है। ट्रंप का ओमान को धमकाना इस बात का संकेत है कि अमेरिका अब छोटे देशों को भी बर्दाश्त नहीं करना चाहता, जो उसकी नीतियों से अलग रास्ता अपनाते हैं। लेकिन इस तरह की भाषा से क्षेत्रीय सहयोग कमजोर होता है और विरोधी ताकतों को एकजुट होने का मौका मिलता है।
भारत के लिए पश्चिम एशिया का यह संकट बेहद अहम है, क्योंकि भारत का बड़ा हिस्सा तेल और गैस इसी क्षेत्र से आता है। अगर होर्मुज जलमार्ग में कोई रुकावट आती है तो भारत में महंगाई बढ़ सकती है। साथ ही खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा भी चिंता का विषय है।
भारत सरकार ने अब तक संतुलित रुख अपनाया है। उसने शांति और संवाद की वकालत की है और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। लेकिन अगर हालात और बिगड़ते हैं तो भारत को अपनी ऊर्जा और कूटनीतिक नीति में बदलाव करना पड़ सकता है।
फिलहाल हालात बहुत नाजुक हैं। ट्रंप की धमकी के बाद ओमान ने अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि मस्कट में बेचैनी है। ईरान ने भी अपने बयान के बाद अपनी सेना को हाई अलर्ट पर रख दिया है।
गाजा में शांति वार्ता का भविष्य भी अनिश्चित है, क्योंकि इजरायल के अंदर ही इस मुद्दे पर मतभेद हैं और हमास किसी भी समझौते से पहले युद्धविराम और कैदियों की रिहाई की मांग कर रहा है।
यमन में हूती हमलों के कारण लाल सागर में जहाजों का आना-जाना पहले ही प्रभावित हुआ है और अगर यह सिलसिला जारी रहा तो वैश्विक व्यापार पर बड़ा असर पड़ेगा।
पश्चिम एशिया एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ा है। अमेरिका की आक्रामक नीति, ईरान का जवाबी रवैया, इजरायल-फिलिस्तीन का अधूरा संघर्ष और यमन का गृहयुद्ध, सब मिलकर इस क्षेत्र को अस्थिर कर रहे हैं।
डॉनल्ड ट्रंप का बयान केवल एक धमकी नहीं है। यह उस नई विश्व राजनीति का संकेत है, जहां ताकतवर देश छोटे देशों को सीधे आंख दिखा रहे हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि इस तरह की धमकियों से समस्या सुलझती नहीं, बल्कि और गहरी होती है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय एकजुट होकर बातचीत का रास्ता निकाले, नहीं तो होर्मुज से लेकर गाजा तक फैली यह आग पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले सकती है और इसका सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को उठाना पड़ेगा।















