दिल्ली, 20 अगस्त।
बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक या प्रतिबंध लगाने की मांग से जुड़ी जनहित याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि यह विषय नीतिगत निर्णय के दायरे में आता है और इस पर फैसला लेना केंद्र सरकार के लिए उचित होगा। अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए केंद्र सरकार से याचिका में उठाए गए मुद्दों पर विचार कर उचित निर्णय लेने को कहा।
न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने कहा कि केंद्र सरकार याचिकाकर्ताओं के सुझावों पर विचार करेगी और इस मामले से जुड़े सभी हितधारकों, जिनमें सोशल मीडिया मंच भी शामिल हैं, से परामर्श के बाद आगे का फैसला लेगी। अदालत ने इस मामले में सरकार के निर्णय के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी न्यायालय के लिए यह निर्देश देना उचित नहीं है कि किसी सोशल मीडिया मंच पर रोक लगाई जाए या प्रतिबंध लगाया जाए। पीठ ने कहा कि यह विषय सरकार के नीति निर्धारण के क्षेत्र में आता है और सरकार को सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद निर्णय लेना चाहिए।
यह आदेश तीन वर्षीय बच्ची की मां कीर्ति दुआ और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शरद गुप्ता की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। याचिका में बच्चों को सोशल मीडिया पर अनुचित और यौन सामग्री की अनियंत्रित पहुंच से बचाने तथा बाल यौन शोषण सामग्री पर रोक लगाने की मांग की गई थी।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लेख करते हुए कहा गया कि सोशल मीडिया पर अनुचित सामग्री की पहुंच बच्चों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 39(एफ) के तहत बच्चों को शोषण से बचाने की राज्य की जिम्मेदारी का भी उल्लेख किया गया।
याचिका में 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए युवाओं में बढ़ती सोशल मीडिया लत और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताओं का मुद्दा उठाया गया। याचिकाकर्ताओं ने स्वैच्छिक उपायों के बजाय इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए बाध्यकारी कानून की आवश्यकता बताई।
सुनवाई के दौरान मेटा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा कि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर बाल यौन शोषण सामग्री को नियंत्रित करने के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि आपत्तिजनक सामग्री की पहचान के लिए फोटो डीएनए सहित कई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद और अधिवक्ता अंशुल गुप्ता ने मेटा को आपत्तिजनक सामग्री हटाने के लिए तकनीकी व्यवस्था और लेखा-परीक्षण प्रणाली लागू करने के निर्देश देने की मांग की। अदालत ने कहा कि इन सभी मुद्दों पर केंद्र सरकार विचार करेगी।















