नई दिल्ली, 20 अगस्त।
उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि पुलिस आम तौर पर भ्रूण लिंग परीक्षण से जुड़े मामलों में सीधे तौर पर जांच करने और प्राथमिकी दर्ज करने की अधिकारारी नहीं होती है। न्यायालय ने कहा कि इस विशिष्ट कानून के अंतर्गत तय किए गए उपयुक्त प्राधिकारियों को ही ऐसे मामलों में मुख्य और निर्णायक भूमिका निभानी चाहिए।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि इस कानूनी प्रक्रिया के तहत पुलिस की भूमिका केवल सीमित और सहायक स्तर तक ही हो सकती है, जब संबंधित प्राधिकारी द्वारा उसकी मांग की जाए। न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस पुराने फैसले पर अपनी सहमति जताई जिसमें यह कहा गया था कि पीसीपीएनडीटी कानून के उल्लंघन से जुड़े मामलों में पुलिस प्राथमिक जांच एजेंसी के रूप में काम नहीं कर सकती।
यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश के एक चिकित्सक से जुड़ा हुआ था जिस पर अवैध रूप से भ्रूण का लिंग जांचने का आरोप लगाया गया था। न्यायालय ने तकनीकी प्रकृति और चिकित्सकीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए यह फैसला सुनाया है ताकि कानून के नियमों का सही ढंग से और उचित अधिकारियों के माध्यम से ही पालन सुनिश्चित किया जा सके।















