रांची, 20 अगस्त।
झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसके तहत 11वीं और 13वीं झारखंड लोक सेवा आयोग परीक्षाओं तथा इनके आधार पर हुई नियुक्तियों को रद्द किया गया था। हाई कोर्ट के इस फैसले से नियुक्त किए जा चुके अधिकारियों को राहत मिली है। अदालत ने यह आदेश सरकार के निर्णय के खिलाफ नवनियुक्त अधिकारियों की ओर से दायर विभिन्न याचिकाओं की सुनवाई के दौरान दिया।
यह मामला उन भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है, जिनकी जांच सीआईडी और विशेष जांच दल की रिपोर्ट के आधार पर की गई थी। इसके बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली झारखंड सरकार ने झारखंड लोक सेवा आयोग और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की ओर से आयोजित 44 भर्ती परीक्षाओं की सूची जारी की थी, जिनमें से कई परीक्षाओं को अनियमितताओं के आरोपों के बाद रद्द करने का निर्णय लिया गया।
सरकार का यह फैसला परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों के विरोध में विद्यार्थियों के 25 दिन तक चले आंदोलन के बाद सामने आया था। सरकार ने जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षा व्यवस्था में सुधार के उपायों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने की घोषणा भी की थी।
रद्द की गई परीक्षाओं में औषधि निरीक्षक, सहायक प्राध्यापक, उप समाहर्ता, दंत चिकित्सक, सहायक अभियंता, सिविल जज, अपर लोक अभियोजक और वन क्षेत्र पदाधिकारी समेत कई पदों पर भर्ती से जुड़ी परीक्षाएं शामिल थीं।
सूची में सरकारी पॉलीटेक्निक के व्याख्याताओं, वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारियों, सहायक वन संरक्षकों तथा विभिन्न प्रशासनिक और तकनीकी पदों की परीक्षाएं भी शामिल थीं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से मुख्य तर्क दिया गया कि सरकार ने परीक्षाओं और उसके बाद हुई नियुक्तियों को एकतरफा रद्द कर दिया और प्रभावित अभ्यर्थियों को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया। बड़ी संख्या में चयनित अभ्यर्थी नियुक्ति के बाद सरकारी सेवा में शामिल भी हो चुके थे। ऐसे में सरकार के फैसले से उनकी नौकरी सीधे प्रभावित हुई।
याचिकाकर्ताओं ने अपने पक्ष में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का भी हवाला दिया। उनका कहना था कि जांच में यदि किसी अभ्यर्थी की भूमिका संदिग्ध पाई गई है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए, लेकिन सभी सफल अभ्यर्थियों को व्यक्तिगत जांच या सुनवाई का अवसर दिए बिना नौकरी से हटाना उचित नहीं होगा।















