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संपादकीय
21 Aug, 2026

नेताओं के खिलाफ 4192 मुकदमे न्याय के दरवाजे पर लगी तारीख पर तारीख की कतार

सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित हजारों आपराधिक मामलों ने न्याय व्यवस्था और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर नई बहस शुरू कर दी है।

नई दिल्ली, 21 अगस्त।

कहते हैं कानून सबके लिए बराबर होता है, लेकिन जब बात सांसद और विधायक की आती है तो कानून भी शायद चाय पीकर सुस्ताने लगता है। सुप्रीम कोर्ट में पेश हुई ताजा रिपोर्ट ने फिर से याद दिलाया कि हमारे जनप्रतिनिधियों के सिर पर मुकदमों का मुकुट कितना भारी है। देशभर में सांसदों और विधायकों के खिलाफ कुल 4192 आपराधिक मामले लंबित हैं और इनमें से 519 मामले ऐसे हैं, जिनकी उम्र दस साल से ज्यादा हो चुकी है। यानी ये मुकदमे इतने पुराने हैं कि इनके साथ पैदा हुए बच्चे अब वोट देने लायक हो गए होंगे। न्यायालय अब अदालत कम और अतिथि गृह ज्यादा बन गए हैं, जहां मुकदमे आते हैं, चाय पीते हैं और अगली तारीख लेकर चले जाते हैं। आंकड़ों का खेल भी कम दिलचस्प नहीं है। 519 मामले दस साल पुराने हैं, 754 मामले पांच साल से अधिक पुराने हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, 4192 में से 519 मामले दस साल से अधिक पुराने हैं, 754 मामले पांच से दस साल के बीच हैं, 562 मामले तीन से पांच साल के हैं और 1094 मामले तीन साल से कम पुराने हैं। नए मामले तो आते ही जा रहे हैं और पुराने मामले विदा लेने का नाम नहीं ले रहे। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी शादी में मेहमान आते जाएं, लेकिन कोई जाता न हो और अंत में घर में पैर रखने की जगह न बचे। सबसे मजेदार बात यह है कि ये आंकड़े हर साल थोड़े-थोड़े बढ़ते जाते हैं। पिछले साल 4000 थे, इस साल 4192 हो गए। अगले साल शायद 4500 हो जाएं। लगता है मुकदमों की भी जनसंख्या बढ़ रही है।

राज्यवार सूची देखें तो उत्तर प्रदेश ने 1094 मामलों के साथ बाजी मार ली है। महाराष्ट्र 543 के साथ दूसरे नंबर पर है। बिहार 373 और पश्चिम बंगाल 364 के साथ मैदान में डटे हैं। दक्षिण में भी प्रतिस्पर्धा कम नहीं है। केरल में 543 और तमिलनाडु में 330 मामले हैं। लगता है हर राज्य अपने जनप्रतिनिधियों को मुकदमों का तोहफा देने में लगा है। कुछ छोटे राज्य जैसे हिमाचल और सिक्किम में मामले कम हैं। शायद वहां नेताओं के पास मुकदमा करने का समय नहीं है या फिर वहां के वकील इतने व्यस्त हैं कि नया केस लेने से मना कर देते हैं।

इन 4192 मामलों में क्या नहीं है? हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, फिरौती, भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, दंगा और चुनाव में गड़बड़ी के आरोप भी शामिल हैं। कुछ नेता ऐसे हैं, जिनके खिलाफ इतने मामले हैं कि अगर एक फाइल गिरे तो दूसरी अपने आप खुल जाती है और कुछ ऐसे हैं, जिनके नाम सुनते ही पुलिस भी कहती है, अरे, ये फिर आ गए। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार चिंता जताई है कि आपराधिक छवि वाले लोग जब कानून बनाने बैठेंगे तो कानून की हालत क्या होगी। लेकिन जवाब में दलों का तर्क होता है कि जनता ने चुना है, हम क्या करें।

इस समस्या को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के कहने पर फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए गए। दिल्ली में एक विशेष अदालत और बाकी राज्यों में भी अलग बेंच बनीं। उद्देश्य था कि एक साल में निपटारा हो जाए, लेकिन हकीकत यह है कि फास्ट ट्रैक की ट्रेन भी भारतीय रेल की तरह लेट चल रही है। गवाह नहीं आते, वकील तारीख मांगते हैं और जज कहते हैं-अगली तारीख। फास्ट ट्रैक कोर्ट भी धीरे-धीरे स्लो ट्रैक बन गए।

इन मुकदमों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आरोप तय होने तक नेता आराम से संसद और विधानसभा में भाषण देते हैं, कानून बनाते हैं और जनता को नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं। वहीं दूसरी तरफ पीड़ित परिवार अदालत के चक्कर काटते-काटते थक जाते हैं। कुछ के केस में गवाह मुकर जाते हैं, कुछ के सबूत गायब हो जाते हैं और कुछ बस हार मानकर बैठ जाते हैं। कानून कहता है कि जब तक दोष साबित न हो, तब तक सब निर्दोष हैं, लेकिन दस-दस साल तक निर्दोष बने रहने का रिकॉर्ड भी अपने आप में एक उपलब्धि है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजनीतिक दल क्या कर रहे हैं? जवाब है-कुछ नहीं। चुनाव आता है तो टिकट बंटते हैं और अक्सर सबसे चर्चित नाम वही होते हैं, जिनके नाम के आगे कई धाराएं लगी हों। दल कहते हैं कि जनता चुनती है, लेकिन जनता के पास विकल्प भी तो वही होते हैं, जिन्हें दल मैदान में उतारते हैं। यह उसी तरह है जैसे मेन्यू में केवल दो डिश हों और दोनों में मिर्च ज्यादा हो। मतदाता बेचारा सोचता है, चलो कम मिर्च वाला चुन लेते हैं।

यह कहना भी गलत होगा कि सिर्फ नेता दोषी हैं। अदालतों पर पहले से ही मामलों का पहाड़ है। जजों की कमी है, स्टाफ कम है, बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। एक जज के पास हजारों फाइलें हैं। ऐसे में सांसद-विधायक के केस को प्राथमिकता दें तो आम आदमी का केस और लटक जाएगा। सिस्टम को मजबूत किया जाए, नए जज भर्ती हों, तकनीक का इस्तेमाल हो और अनावश्यक तारीखों पर लगाम लगे। सोचिए, एक तरफ देश डिजिटल इंडिया की बात कर रहा है, दूसरी तरफ अदालतों में फाइलें धूल खा रही हैं। एक तरफ नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ भाषण देते हैं, दूसरी तरफ उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के केस दस साल से लंबित हैं। यह कैसा लोकतंत्र है, जहां कानून बनाने वाले ही कानून के कटघरे में खड़े हैं और कटघरा भी कहता है, सर, आप बैठिए, चाय पिएंगे।

4192 का आंकड़ा केवल संख्या नहीं है। यह हमारे सिस्टम की हकीकत है। यह बताता है कि राजनीति, अपराध और न्याय के बीच का रिश्ता कितना उलझा हुआ है। अगर 519 दस साल पुराने मामले एक साल में निपट जाएं तो शायद जनता का भरोसा लौट आए। अगर राजनीतिक दल साफ छवि वाले लोगों को टिकट दें तो शायद नए मामले कम हों। लेकिन जब तक नेता वादे करेंगे, वकील तारीख लेंगे और अदालतें इंतजार करेंगी, तब तक यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा। जनता के पास एक ही हथियार है-वोट। इस बार सोच-समझकर देना होगा, क्योंकि जिस दिन जनता जागरूक हो जाएगी, उस दिन न सिर्फ मुकदमे कम होंगे, बल्कि मुकदमे वाले नेता भी कम हो जाएंगे। तब शायद कानून वाकई सबके लिए बराबर होगा और न्याय तारीख पर नहीं, समय पर मिलेगा।

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