भोपाल, 21 अगस्त।
मध्य प्रदेश सरकार ने ब्रिटिश काल के सात पुराने कानूनों को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया है। राज्यपाल की मंजूरी के बाद सरकार ने इन कानूनों के निरसन की अधिसूचना जारी कर दी है। अब ये कानून प्रदेश में कहीं भी लागू नहीं होंगे।
ये सभी कानून 1933 से 1947 के बीच सेंट्रल प्रोविंस एंड बरार के समय में बनाए गए थे। 1 नवंबर 1956 को मध्य प्रदेश बनने के बाद भी ये कानून प्रदेश में चले आ रहे थे। सरकार का कहना है कि समय के साथ ये कानून अप्रासंगिक हो गए थे और नए कानून बन जाने से इनकी जरूरत नहीं रही।
विधि विभाग की समीक्षा में पाया गया कि जमीन, कर्ज, शिक्षा और राहत से जुड़े ये कानून अब वर्तमान परिस्थितियों से मेल नहीं खाते। नए और आधुनिक अधिनियम पहले से लागू हैं, इसलिए पुराने कानूनों की वजह से कई बार अदालतों में भ्रम की स्थिति बनती थी। पिछले विधानसभा सत्र में सरकार ने निरसन विधेयक पेश किया था, जो पारित होने के बाद 7 अगस्त को राज्यपाल से मंजूरी प्राप्त कर चुका है।
डेट कन्सीलिएशन एक्ट, 1933 कर्ज विवादों के निपटारे के लिए बना था। प्रोटेक्शन ऑफ डेटर्स एक्ट, 1937 कर्जदारों को शोषण से बचाने के लिए था। फेमाइन रिलीफ फंड एक्ट, 1937 अकाल में राहत कार्य के लिए था। रिलीफ ऑफ इंडेटेडनेस एक्ट, 1939 कर्ज के बोझ से राहत देने वाला कानून था। विद्या मंदिर एक्ट, 1940 स्कूल और शिक्षा योजनाओं से जुड़ा था। एमपी रेगुलेशन ऑफ क्वैकिंग एक्ट, 1944 अयोग्य लोगों द्वारा इलाज पर रोक लगाता था। लैंड सर्वे एक्ट, 1947 भूमि सर्वेक्षण से संबंधित था। अब इन सभी क्षेत्रों में नए और व्यापक कानून लागू हैं, इसलिए इन पुराने कानूनों को हटाया गया है।
सरकार का मानना है कि पुराने कानून हटने से न्यायिक प्रक्रिया सरल होगी और मामलों का निपटारा जल्दी होगा। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन और कर्ज के विवादों में इसका सकारात्मक असर दिखेगा। कानून विशेषज्ञों ने भी इस कदम को स्वागत योग्य बताया है। उनका कहना है कि औपनिवेशिक काल के कानूनों को हटाकर कानून व्यवस्था को आधुनिक बनाना जरूरी था।
चल रहा है कानूनों की छंटनी का अभियान
केंद्र सरकार के निर्देश पर देशभर में पुराने और अप्रासंगिक कानूनों को हटाने का काम चल रहा है। उसी कड़ी में मध्य प्रदेश सरकार ने भी यह बड़ा फैसला लिया है। अब प्रदेश में केवल वही कानून रहेंगे, जो आज की जरूरतों के हिसाब से बने हैं।
सात पुराने कानूनों के निरस्त होने के साथ प्रदेश से अंग्रेजी राज की एक और निशानी मिट गई है। सरकार का यह कदम कानूनों को सरल, पारदर्शी और जनता के अनुकूल बनाने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है।















