नई दिल्ली, 22 अगस्त।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति संजय करोल शनिवार को सेवानिवृत्त हो गए। विदाई समारोह में दिए अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि जज भगवान नहीं होते और उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि उनका हर फैसला पूरी तरह सही ही होगा। उन्होंने कहा कि न्याय करने के लिए विनम्रता बेहद जरूरी है।
न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि न्यायाधीशों को किसी मामले में केवल याचिकाकर्ता के रूप में सामने आए व्यक्ति को नहीं देखना चाहिए, बल्कि उसके पीछे मौजूद इंसान को भी समझना चाहिए। उनके अनुसार, संविधान न्यायाधीशों से केवल कानून को सही तरीके से लागू करने की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि उसे न्यायपूर्ण तरीके से लागू करने की जिम्मेदारी भी देता है।
उन्होंने विदाई भाषण में संवैधानिकता और न्याय के अर्थ पर भी विस्तार से बात की। न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि कानून, उचित प्रक्रिया और संवैधानिक वैधता जैसी अवधारणाओं को समझने का सरल माध्यम धर्म हो सकता है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यहां धर्म का मतलब किसी अनुष्ठान से नहीं, बल्कि कर्तव्य से है।
न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि एक न्यायाधीश का कर्तव्य न्याय का सम्मान करना और यह सुनिश्चित करना है कि अदालत के सामने आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को देखा और सुना जाए। व्यक्ति कितना भी कमजोर या छोटा क्यों न हो, उसकी बात को समान महत्व मिलना चाहिए।
उन्होंने अपनी करीब चार दशक लंबी कानूनी यात्रा को भी याद किया। न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि अदालत उनके लिए कभी केवल काम करने की जगह नहीं रही। कोर्ट रूम ने उन्हें हमेशा सहारा दिया और उनके जीवन में उससे कहीं बड़ी तथा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने बताया कि अदालतों से उनका जुड़ाव करीब 40 वर्षों का रहा है। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने वकील के तौर पर अदालतों में पैरवी करते हुए की थी। इसके बाद करीब 19 वर्षों तक उन्होंने न्यायाधीश के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाईं।
न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि न्यायिक जिम्मेदारी के दौरान मानवीय दृष्टिकोण बनाए रखना जरूरी है। उनके अनुसार, न्याय व्यवस्था में कानून के साथ संवेदनशीलता और विनम्रता का संतुलन होना चाहिए, क्योंकि अदालत के सामने आने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ एक मानवीय कहानी भी लेकर आता है।















