भोपाल, 22 अगस्त।
मध्यप्रदेश की जेलों में बंद कैदियों को लेकर एक नई पहल शुरू हुई है, जो लंबे समय से जरूरी मानी जा रही थी। अभी तक जेलों को सजा काटने की जगह के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन अब सोच बदल रही है कि क्या जेलों को सुधार गृह के रूप में विकसित किया जा सकता है। भोपाल सेंट्रल जेल से इस प्रयोग की शुरुआत होना सकारात्मक संकेत है। यदि यह प्रयोग सफल रहा तो पूरे प्रदेश की जेल व्यवस्था की तस्वीर बदल सकती है।
प्रदेश में करीब 42 हजार बंदी हैं और उनमें 954 मानसिक बीमारी से जूझ रहे हैं। ऐसे में केवल सजा देना समाधान नहीं है, बल्कि मानसिक और व्यवहारिक सुधार भी जरूरी है। अक्सर देखा गया है कि कुछ अपराधी जेल से छूटने के बाद फिर अपराध की दुनिया में लौट आते हैं। पुलिस उन्हें पकड़ती है, अदालत सजा देती है और वे फिर जेल आ जाते हैं। यह एक दुष्चक्र बन गया है। मध्यप्रदेश में पहली बार इस दुष्चक्र को तोड़ने के लिए वैज्ञानिक तरीके से काम शुरू किया गया है।
भोपाल की सेंट्रल जेल में आदतन अपराधी और हार्डकोर कैदियों की स्क्रीनिंग की जाएगी। राष्ट्रीय रक्षा यूनिवर्सिटी (आरआरयू) और केंद्रीय गृह मंत्रालय के सहयोग से इस योजना को अंजाम दिया जा रहा है। गुजरात की यह यूनिवर्सिटी पहली बार मध्यप्रदेश की जेलों में वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक अध्ययन करेगी। इसका मकसद यह पता लगाना है कि आखिर क्यों कुछ लोग बार-बार अपराध करते हैं और उन्हें सुधारा कैसे जा सकता है।
इस प्रक्रिया को चार चरणों में बांटा गया है। पहले चरण में शुरुआती स्क्रीनिंग होगी। फिलहाल भोपाल सेंट्रल जेल की महिला बंदियों की स्क्रीनिंग की जा रही है और अब आरआरयू की टीम के साथ सजायाफ्ता कैदियों की भी स्क्रीनिंग शुरू की जाएगी। दूसरे चरण में समस्याओं की पहचान होगी। इसमें नींद न आना और जेल के माहौल में ढलने में परेशानी जैसी मानसिक दिक्कतों का अध्ययन किया जाएगा। तीसरे चरण में जेल विभाग के स्टाफ को प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके लिए सात दिन का बेसिक ट्रेनिंग प्रोग्राम आयोजित किया जा चुका है। चौथे चरण में समस्याओं की पहचान के बाद कैदियों की थेरेपी शुरू की जाएगी।
अब तक बंदियों को सुधारने के लिए योग, ध्यान और भजन जैसे पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल होता रहा है। अब विपासना के साथ आधुनिक थेरेपी, जैसे रेशनल इमोटिव बिहेवियर थेरेपी, का भी इस्तेमाल किया जाएगा। हार्डकोर अपराधियों के मानसिक और व्यवहार संबंधी कारणों को समझना जरूरी है, ताकि दोबारा अपराध की आशंका कम की जा सके।
डीजी जेल वरुण कपूर के अनुसार, इस सेंटर की शुरुआत भोपाल सेंट्रल जेल में सितंबर के पहले सप्ताह में होगी। दो महीने के भीतर इंदौर में भी सेंटर खोला जाएगा। इसके बाद प्रदेश की सभी 11 सेंट्रल जेलों में यह व्यवस्था शुरू होगी। अब तक दो हजार से ज्यादा बंदियों की साइकोलॉजिकल स्क्रीनिंग हो चुकी है।
जेल व्यवस्था का असली मकसद बदला लेना नहीं, बल्कि सुधार करना होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति जेल से निकलकर फिर अपराध करता है तो यह व्यवस्था की विफलता है। हार्डकोर शब्द के पीछे भी एक इंसान है, जिसकी अपनी कहानी और मानसिक स्थिति है। उसे समझे बिना अपराध को खत्म नहीं किया जा सकता। थेरेपी और काउंसलिंग का यह मॉडल सफल रहा तो मध्यप्रदेश की जेलें केवल चारदीवारी नहीं, बल्कि सुधार की प्रयोगशाला बन सकती हैं।














