भोपाल, 23 अगस्त।
घर से बिछड़ने वाले बच्चों के लिए मध्य प्रदेश पुलिस और बाल संरक्षण संस्थाओं की संवेदनशील पहल उम्मीद की किरण बन रही है। पुलिस और एसओएस बाल ग्राम के समन्वय से ऐसे बच्चों की सुरक्षा, देखभाल, पहचान, परामर्श और परिवार से पुनर्मिलन की दिशा में लगातार काम किया जा रहा है।
पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाणा के मार्गदर्शन और पुलिस उप महानिरीक्षक डॉ. विनीत कपूर के नेतृत्व में सामुदायिक पुलिसिंग के तहत पुलिस, स्वयंसेवी संस्थाओं और सामाजिक संगठनों को साथ जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य जरूरतमंद और कमजोर वर्गों के लिए सहयोग का मजबूत तंत्र तैयार करना है।
पुलिस मुख्यालय के अनुसार, बच्चों को सुरक्षित संरक्षण देने के साथ उनकी पहचान और परिजनों की तलाश के लिए संबंधित पुलिस इकाइयों से समन्वय किया जाता है। इस प्रक्रिया में बाल संरक्षण संस्थाओं की भूमिका भी अहम है।
डर के कारण ट्रेन से उतरे भाई-बहन15 अगस्त की रात रायसेन में एक बालक और बालिका भटकते हुए मिले। दोनों एक दोस्त के साथ घर से निकले थे और ट्रेन से यात्रा कर रहे थे। रास्ते में उन्हें इस बात का डर लगा कि उन्हें कहां ले जाया जा रहा है, इसलिए दोनों बीच रास्ते में ट्रेन से उतर गए।
बच्चों के पास किसी परिजन का मोबाइल नंबर नहीं था। उन्हें अपने घर के बारे में भी सीमित जानकारी थी। पुलिस ने दोनों को तत्काल सुरक्षित संरक्षण में लिया और बाल संरक्षण संस्था की मदद से परिजनों की तलाश शुरू की।
जबलपुर पुलिस नियंत्रण कक्ष और संबंधित पुलिस इकाइयों से संपर्क कर उपलब्ध पते के आधार पर परिवार की पहचान की गई। जरूरी प्रक्रिया पूरी होने के बाद बाल कल्याण समिति के माध्यम से दोनों बच्चों को उनके माता-पिता को सौंप दिया गया।
दिल्ली से भटककर भोपाल पहुंची किशोरी15-16 वर्ष की एक किशोरी गलती से दिल्ली से आने वाली ट्रेन में बैठकर भोपाल पहुंच गई। डर के कारण उसने अपनी सुरक्षा के लिए अपने बारे में गलत कहानी बताई और अपना हुलिया भी कुछ बदल लिया था।
भोपाल और छतरपुर पुलिस नियंत्रण कक्ष के माध्यम से जानकारी की जांच की गई। पता चला कि किशोरी के माता-पिता जीवित हैं और उसकी तलाश कर रहे हैं। उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज थी।
फोटो का मिलान करने पर उसकी वास्तविक पहचान सामने आई। पुलिस और संस्था के संयुक्त प्रयास से केवल तीन दिन में किशोरी को उसके परिवार से मिला दिया गया।
रेलवे ट्रैक पर मिला बच्चारानी कमलापति रेलवे स्टेशन के पास रेलवे ट्रैक पर 7-8 वर्ष का बच्चा भटकता मिला। वह अपनी पहचान के बारे में बहुत कम जानकारी दे पा रहा था और केवल गोविंदपुरा का नाम बता रहा था।
पुलिस की त्वरित कार्रवाई और गोविंदपुरा थाने के स्तर पर किए गए समन्वय से पता चला कि बच्चे की गुमशुदगी पहले ही दर्ज थी। जरूरी सत्यापन के बाद उसे सुरक्षित परिवार तक पहुंचाया गया।
एक अन्य मामले में एक किशोर लंबे समय तक अपना सही नाम और पता नहीं बता पा रहा था। वह खुद को सागर का निवासी बता रहा था, लेकिन वहां उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली।
बाल संरक्षण संस्था के कर्मचारियों ने उससे लगातार बातचीत और परामर्श किया। बाद में किशोर ने नई जानकारी दी, जिसके आधार पर संबंधित क्षेत्र की पुलिस से संपर्क किया गया।
वहां एक बच्चे की गुमशुदगी की जानकारी मिली। फोटो मिलाने पर उसकी पहचान की पुष्टि हुई और लंबे समय से परिवार से दूर रहे बच्चे को आखिरकार उसके घर पहुंचाया गया।
दूसरे राज्यों से भी बच्चों की वापसीमध्य प्रदेश पुलिस और एसओएस बाल ग्राम का समन्वय प्रदेश के बाहर भी बच्चों को उनके परिवार तक पहुंचाने में मदद कर रहा है। जनवरी में 14-15 वर्ष के एक किशोर को सुरक्षित उत्तर प्रदेश के झांसी तक पहुंचाया गया।
इसी तरह 15 वर्षीय एक अन्य बच्चे के मामले में पुलिस नियंत्रण कक्ष के माध्यम से बिहार के भभुआ जिले के मोहनिया थाना पुलिस से संपर्क किया गया। इसके बाद उसे परिवार से मिलाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
फिलहाल राजगढ़ जिले के खुजनेर क्षेत्र से जुड़े एक बच्चे और बिहार के सीवान क्षेत्र के एक बच्चे को भी उनके परिवार तक सुरक्षित पहुंचाने की प्रक्रिया जारी है।
भटके बच्चे की जानकारी तुरंत पुलिस को देंकिसी नागरिक को कोई बच्चा अकेला, भटका हुआ या असहाय दिखाई दे तो उसे लंबे समय तक अपने पास रखने के बजाय तत्काल पुलिस या बाल सहायता तंत्र को सूचना देनी चाहिए।
नागरिक डायल-112 या बाल सहायता सेवा 1098 पर सूचना दे सकते हैं। सूचना मिलने के बाद पुलिस और बाल संरक्षण संस्थाएं बच्चे को सुरक्षित संरक्षण देती हैं और जरूरी कानूनी प्रक्रिया के जरिए उसे परिवार तक पहुंचाने का प्रयास करती हैं।
परिवार तक पहुंचाने की तय प्रक्रियाभटके हुए बच्चे को सबसे पहले पुलिस सुरक्षित संरक्षण में लेती है। आवश्यक प्रविष्टि के साथ उसका चिकित्सकीय परीक्षण कराया जाता है। इसके बाद नियमानुसार उसे बाल संरक्षण संस्था में रात्रि प्रवास के लिए भेजा जाता है और अगले दिन बाल कल्याण समिति के सामने प्रस्तुत किया जाता है।
संस्था के प्रशिक्षित कार्यकर्ता बच्चे से संवेदनशील तरीके से बातचीत कर उसके घर, माता-पिता और पते से जुड़ी जानकारी जुटाते हैं। इसके आधार पर पुलिस नियंत्रण कक्ष के जरिए संबंधित जिले या राज्य की पुलिस से संपर्क कर गुमशुदगी की जानकारी का सत्यापन किया जाता है।
पहचान की पुष्टि होने के बाद बाल कल्याण समिति की जरूरी प्रक्रिया पूरी की जाती है। इसके बाद बच्चे को उसके माता-पिता या वैध अभिभावक को सुरक्षित रूप से सौंप दिया जाता है।
जिन बच्चों का परिवार नहीं, उनके लिए भी व्यवस्थाजिन बच्चों के माता-पिता जीवित नहीं हैं, उनके दादा-दादी या अन्य उपयुक्त रिश्तेदारों की तलाश की जाती है। इसके बाद बच्चे को उनके संरक्षण में सौंपने का प्रयास किया जाता है।
बच्चों की शिक्षा और पोषण सुनिश्चित करने के लिए संस्था आर्थिक सहायता भी देती है। वर्तमान में भोपाल और विदिशा के 83 बच्चे इस योजना का लाभ ले रहे हैं।
यदि किसी बच्चे का कोई पारिवारिक सहारा नहीं मिलता है तो तय कानूनी प्रक्रिया के बाद उसे गोद लेने के लिए कानूनी रूप से स्वतंत्र घोषित करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसका उद्देश्य बच्चे को सुरक्षित और स्थायी परिवार उपलब्ध कराना है।
बच्चों और परिवारों को मजबूत करने में संस्था की भूमिकाएसओएस चिल्ड्रेन्स विलेजेज इंडिया एक स्वतंत्र, गैर-सरकारी और गैर-लाभकारी संस्था है। यह माता-पिता की देखभाल से वंचित और परित्यक्त बच्चों के संरक्षण, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा समग्र विकास के साथ कमजोर परिवारों को मजबूत बनाने के लिए काम करती है।
संस्था वर्ष 1964 से भारत में कार्यरत है और अब तक 65 हजार से अधिक बच्चों तक पहुंच बना चुकी है। इसकी परिवार जैसा देखभाल व्यवस्था बच्चों को सुरक्षित और स्नेहपूर्ण वातावरण उपलब्ध कराती है।
परिवार सशक्तीकरण कार्यक्रम के माध्यम से कमजोर परिवारों, महिलाओं और बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, कौशल विकास और आजीविका के क्षेत्रों में सहायता दी जाती है।
बाल संरक्षण के क्षेत्र में पुलिस के साथ समन्वय कर संस्था भटके और परिवार से बिछड़े बच्चों को सुरक्षित संरक्षण, संवेदनशील परामर्श और जरूरी सहयोग उपलब्ध कराती है। पुलिस और बाल कल्याण समिति के साथ मिलकर बच्चों को उनके परिवारों तक पहुंचाने में भी संस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।















