नई दिल्ली, 25 अगस्त।
नई दिल्ली। नागरिकता पाने की प्रक्रिया को आसान और तेज करने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा बदलाव किया है। नागरिकता (तीसरा संशोधन) नियम, 2026 के तहत अब गुजरात, राजस्थान, पंजाब, पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर व लद्दाख के संबंधित जिला कलेक्टर सीएए की धारा 6बी के तहत पात्र आवेदनों पर सीधे फैसला कर सकेंगे। असम और त्रिपुरा के जनजातीय क्षेत्र इसके दायरे से बाहर हैं।
नई व्यवस्था में कलेक्टर आवेदन प्राप्त करने, दस्तावेजों की जांच, जरूरी पूछताछ और पात्रता तय करने के बाद नागरिकता देने की प्रक्रिया पूरी कर सकेंगे। वे आवेदक को निष्ठा की शपथ भी दिला सकेंगे। यानी अब सीएए के तहत पात्र आवेदन के अंतिम निस्तारण के लिए केंद्र की सशक्त समिति के स्तर तक जाने की जरूरत नहीं होगी। समितियों के पास पहले से लंबित आवेदन भी संबंधित कलेक्टरों को ट्रांसफर किए जाएंगे। इससे स्थानीय स्तर पर जांच और फैसला होने से प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद है।
पहले जिला स्तर पर आवेदन की जांच के बाद इसे राज्य/यूटी की सशक्त समिति के पास भेजा जाता था। इसकी अध्यक्षता संबंधित जनगणना संचालन निदेशक करते थे। समिति में खुफिया ब्यूरो, एसआईबी, विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (एफआरआरओ), राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) और डाक विभाग के अधिकारी शामिल होते थे। समिति दस्तावेजों और सुरक्षा संबंधी रिपोर्टों की जांच के बाद नागरिकता देने पर फैसला करती थी। इस लंबी प्रक्रिया के कारण हजारों आवेदन सालों से लटके हुए थे। अकेले राजस्थान में करीब 600 आवेदन लंबित हैं।
नई व्यवस्था में छह राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों में जिला कलेक्टरों को सीएए की धारा 6बी के तहत पात्र आवेदनों पर सीधे फैसला करने का अधिकार मिला है। यानी अब कलेक्टर ही सारी जांच पूरी कर अंतिम निर्णय ले सकेंगे।
सरकार के नए प्रावधानों से लंबित नागरिकता आवेदनों के जल्द निपटारे की उम्मीद है। समितियों के पास लंबित आवेदन संबंधित कलेक्टरों को भेजे जाएंगे। इससे इनके जल्द निपटारे की उम्मीद है। आवेदकों को बार-बार राज्य और केंद्र के दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे और स्थानीय स्तर पर ही सत्यापन पूरा हो जाएगा।
पहले भी नौ राज्यों के 31 जिलाधिकारियों को नागरिकता अधिनियम की धारा 5 और 6 के तहत नागरिकता देने की शक्ति मिली हुई थी। नई व्यवस्था में धारा 6बी के तहत अधिकार का दायरा बढ़ाया गया है। धारा 6बी विशेष रूप से सीएए के तहत आए लोगों के लिए बनाई गई है, ताकि उन्हें सामान्य प्रक्रिया से अलग तेजी से नागरिकता मिल सके। इस बदलाव से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के पात्र लोगों को फायदा मिलेगा। उनका 31 दिसंबर 2014 तक भारत आ चुका होना जरूरी है।
ये लोग लंबे समय से भारत में रह रहे हैं, लेकिन नागरिकता न होने के कारण उन्हें सरकारी योजनाओं, बैंक खाते, पासपोर्ट और अन्य अधिकारों में दिक्कत होती थी। अब कलेक्टर स्तर पर फैसला होने से उनकी परेशानी जल्द खत्म होगी। राजस्थान और गुजरात में पाकिस्तान से आए हिंदू परिवारों की संख्या ज्यादा है। जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और जोधपुर जैसे सीमावर्ती जिलों में हजारों परिवार दशकों से रह रहे हैं। अकेले राजस्थान में करीब 600 आवेदन लंबित हैं, जो अब कलेक्टर के पास जाएंगे। इससे इन परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी। गुजरात के कच्छ और बनासकांठा में भी ऐसे कई मामले हैं। इसी तरह पंजाब में भी अफगानिस्तान से आए सिख परिवारों के मामले हैं।
सुरक्षा जांच में कोई ढील नहीं दी जाएगी। कलेक्टर को फैसला करने से पहले एसआईबी और अन्य एजेंसियों की रिपोर्ट लेनी होगी। दस्तावेजों की गहन जांच होगी और पात्रता सुनिश्चित होने पर ही नागरिकता दी जाएगी। अधिकार का विकेंद्रीकरण किया गया है, लेकिन सुरक्षा के मानकों से कोई समझौता नहीं किया गया है।
यह कदम सीएए को जमीन पर उतारने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। लंबे समय से विपक्ष यह आरोप लगाता रहा है कि सीएए केवल कागजों में है, लेकिन अब जिला स्तर पर अधिकार देने से प्रक्रिया तेज होगी। इससे केंद्र की सशक्त समिति पर बोझ कम होगा और आवेदकों को समय पर न्याय मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे नागरिकता मिलने की प्रक्रिया छह महीने से एक साल के भीतर पूरी हो सकेगी, जो पहले दो से तीन साल तक खिंच जाती थी।
सीएए को लेकर देशभर में कई तरह की भ्रांतियां रही हैं, लेकिन सरकार का यह नया नियम उन लोगों के लिए उम्मीद की किरण है, जो वर्षों से नागरिकता का इंतजार कर रहे हैं। कलेक्टर को अधिकार मिलने से पारदर्शिता बढ़ेगी, स्थानीय सत्यापन आसान होगा और फर्जी आवेदनों पर रोक भी लगेगी। जरूरत है कि प्रशासन इस अधिकार का उपयोग संवेदनशीलता और तेजी से करे, ताकि जो लोग प्रताड़ना से भागकर भारत आए हैं, उन्हें जल्द से जल्द भारतीय होने का गर्व मिल सके।















