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संपादकीय
25 Aug, 2026

तारीख पर तारीख और कलियासोत किनारे कंक्रीट का कब्जा, एनजीटी के आदेश पर कुंभकर्णी नींद में नगर निगम और प्रशासन

भोपाल की कलियासोत नदी के किनारे बढ़ते निर्माण और लंबित कार्रवाई ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

भोपाल, 25 अगस्त।

राजधानी भोपाल को झीलों का शहर कहा जाता है, लेकिन अब यह शहर कंक्रीट के जंगल में बदल रहा है और इसका सबसे बड़ा शिकार बनी है कलियासोत नदी। कभी इस नदी को भोपाल का ग्रीन लंग्स कहा जाता था, लेकिन आज उसके दोनों किनारों पर रोज नए बंगले, नई बिल्डिंगें और नए फार्म हाउस बन रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि यह सब नगर निगम की अनुमति से हो रहा है, जबकि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने कई बार अतिक्रमण हटाने के आदेश दिए हैं। लेकिन आदेश कागजों में ही सिमटकर रह गए हैं और प्रशासन सिर्फ अगली तारीख देता जा रहा है। सवाल उठता है कि क्या नगर निगम और जिला प्रशासन जानबूझकर एनजीटी के आदेश की धज्जियां उड़ा रहे हैं या फिर यह कुंभकर्णी नींद जानबूझकर ली गई है?

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, सेंट्रल जोन बेंच, भोपाल ने स्पष्ट आदेश दिया था कि कलियासोत नदी के किनारे के 692 अतिक्रमण चिन्हित कर हटाए जाएं और वहां फेंसिंग, जियो टैगिंग तथा ग्रीन बेल्ट विकसित की जाए। आदेश में कहा गया था कि सेंट्रल वर्ज, साइड वर्ज, पार्क, ग्रीन बेल्ट सहित हर हाल में अवैध कब्जे हटाए जाएं। साथ ही आदेश था कि जहां से कब्जे हटें, वहां वन विभाग खाली कराई गई जमीनों पर सघन पौधरोपण कराएगा। लेकिन हकीकत यह है कि सुनवाई के तहत चिन्हित 692 अतिक्रमणों में से कई अभी भी जस के तस बने हुए हैं, बल्कि नए अतिक्रमण भी बन रहे हैं। कई व्यावसायिक क्लबों को भी नहीं हटाया जा सका था, जिन्हें हटाने के लिए अपर कलेक्टर की अध्यक्षता में समिति गठित कर हर तीन महीने में प्रोग्रेस रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश दिए गए थे।

यह आंकड़ा डराने वाला है। सुनवाई के दौरान पेश आंकड़ों के अनुसार, साल 1990 में भोपाल का ग्रीन कवर लगभग 66 प्रतिशत था, जो 2022 में घटकर मात्र 6 प्रतिशत रह गया। यह आंकड़ा इस बात का सबूत है कि शहर के तापमान में भी बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गई है और 25 से ज्यादा शहरों में वायु गुणवत्ता का स्तर लगातार गिर रहा है। शहर के तापमान में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है और वायु गुणवत्ता का स्तर खराब हो रहा है। पैरामीटर वाइज स्टडी में यह बात सामने आई है कि ग्रीन बेल्ट पर हुए अतिक्रमण, कंक्रीटीकरण और पावर ब्लॉक्स हटाने के आदेश दिए गए हैं। आदेश के तहत सभी संबंधित संस्थान अपने परिसर के सामने की हरियाली और कंटीले तारों की बाड़ की मरम्मत और रखरखाव का पूरा खर्च खुद उठाएंगे। साथ ही ग्रीन बेल्ट का व्यावसायिक उपयोग या कंक्रीटीकरण नहीं होने देंगे। कब्जे हटाने के बाद नगर निगम और वन विभाग को इन स्थानों पर केवल देशी प्रजातियों के ऊंचे पौधों का रोपण कराना होगा, जिनमें बरगद, पीपल, नीम, जामुन, देशी आम, सेमल, कदंब और अर्जुन जैसी देशी प्रजातियों के ऊंचे पौधे लगाने होंगे।

एनजीटी ने भोपाल कलेक्टर और नगर निगम कमिश्नर को अतिक्रमण हटाने की पूरी कार्रवाई की रिपोर्ट अगले तीन महीने में बेंच के समक्ष जमा कराने को कहा है। याचिकाकर्ता की याचिका पर पूर्व में हुई सुनवाई के तहत चिन्हित 692 अतिक्रमणों में से कई अतिक्रमण हटा दिए गए थे, लेकिन शेष बचे आवासीय और व्यावसायिक क्लबों को नहीं हटाया जा सका था। इन्हें हटाने के लिए अपर कलेक्टर की अध्यक्षता में समिति गठित कर हर तीन महीने में प्रोग्रेस रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश दिए गए हैं। साथ ही एनजीटी ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार करने के भी आदेश दिए हैं। भोपाल कलेक्टर और नगर निगम कमिश्नर को अतिक्रमण हटाने की पूरी कार्रवाई की रिपोर्ट अगले तीन महीने में बेंच के समक्ष जमा करानी होगी।

नगर निगम की अनुमति पर सवाल और मिलीभगत का शक

जब एनजीटी ने अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया है तो फिर नगर निगम उन्हीं क्षेत्रों में नए निर्माण की अनुमति कैसे दे रहा है? कलियासोत किनारे रोज नए नक्शे पास हो रहे हैं और बंगले बन रहे हैं। क्या यह एनजीटी के आदेश की सीधी अवमानना नहीं है? जानकारों का कहना है कि यह मिलीभगत के बिना संभव नहीं है। एक तरफ एनजीटी हरियाली बचाने के लिए पौधरोपण का आदेश दे रहा है, दूसरी तरफ नगर निगम कंक्रीट को बढ़ावा दे रहा है। यह दोहरी नीति भोपाल के पर्यावरण को खत्म कर देगी। नगर निगम और जिला प्रशासन की यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या प्रशासन को अदालत का डर नहीं रहा या फिर बिल्डर लॉबी इतनी मजबूत हो गई है कि वह किसी भी आदेश को खरीद सकती है?

भोपाल को स्मार्ट सिटी कहा जाता है, लेकिन स्मार्ट सिटी का मतलब केवल सड़क और बिल्डिंग नहीं होता, बल्कि सांस लेने लायक हवा और पानी भी होता है। कलियासोत नदी भोपाल के बड़े तालाब को पानी देती है और भूजल स्तर को बनाए रखती है। यदि इसके कैचमेंट एरिया में ही अतिक्रमण होता रहा तो आने वाले समय में भोपाल को पानी के लिए तरसना पड़ेगा।

एनजीटी ने वन विभाग को 15 वर्षों तक लगातार निगरानी की जिम्मेदारी दी है। इसके लिए समिति की मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है। शहर में सघन पौधरोपण के तहत लगाए जाने वाले पौधों के जीवित रहने की 15 वर्षों तक लगातार निगरानी की जाएगी। इसके लिए पेड़ों की अनिवार्य जियो टैगिंग, मियावाकी पद्धति से सघन शहरी वनीकरण और 25 से अधिक पेड़ काटने की अनुमति के लिए पीसीसीएफ के अधीन उच्च स्तरीय केंद्रीय प्राधिकरण में वन विभाग, नगर निगम, शहरी विकास विभाग और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रतिनिधियों से 100 गुना तक अनिवार्य क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण सुनिश्चित करने के आदेश जारी किए गए हैं। लेकिन इन आदेशों का पालन कौन कराएगा, जब निगरानी करने वाला ही सो रहा हो?

तारीख पर तारीख का यह खेल बंद होना चाहिए। एनजीटी को अब सख्त रुख अपनाते हुए नगर निगम कमिश्नर और जिला कलेक्टर पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करनी चाहिए और अवमानना की कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही आम नागरिकों को भी आगे आना होगा। कलियासोत केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि पूरे भोपाल की धरोहर है। यदि आज नहीं जागे तो कल सांस लेने के लिए भी तारीख लेनी पड़ेगी।

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