नई दिल्ली, 25 अगस्त।
भारत के नक्शे को ध्यान से देखिए तो एक जगह ऐसी दिखेगी, जहां देश की चौड़ाई सिमटकर महज 22 किलोमीटर रह जाती है। यही है सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे ‘चिकन नेक’ कहा जाता है। यह कोई सामान्य गलियारा नहीं है। यह वह नाड़ी है, जो आठ पूर्वोत्तर राज्यों को भारत के दिल से जोड़ती है। गृह मंत्री अमित शाह ने जब इसे देश की सुरक्षा के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता बताया तो यह महज एक बयान नहीं था, बल्कि आने वाले खतरे की ओर एक गंभीर चेतावनी थी।
यह गलियारा तीन देशों से घिरा है। एक तरफ नेपाल है, दूसरी तरफ बांग्लादेश है और कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर चीन की नजरें गड़ी बैठी हैं। डोकलाम की घटना अभी ज्यादा पुरानी नहीं है, जब चीन ने इस कॉरिडोर के करीब अपनी सड़क बनाने की कोशिश की थी और भारतीय सेना को 73 दिन तक आंख में आंख डालकर खड़ा होना पड़ा था। इसलिए सिलीगुड़ी का महत्व समझना केवल भूगोल नहीं, बल्कि रणनीति को समझना है।
खुली सीमाओं का अभिशाप और एसएसबी की कठिन ड्यूटी
इस कॉरिडोर की सबसे बड़ी चुनौती है खुली सीमा। सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के पास 1751 किलोमीटर नेपाल और 700 किलोमीटर भूटान की बिना बाड़ वाली सीमा की जिम्मेदारी है। यह दुनिया की सबसे कठिन सीमाओं में से एक है। यहां न तो नदी है, न पहाड़, जो रोक सके। यहां रिश्ते हैं, संस्कृति है, रोजगार है, लेकिन इसी खुलेपन का फायदा दुश्मन उठाते हैं।
मानव तस्करी, नशीले पदार्थों की तस्करी, नकली नोट और घुसपैठ - ये सब इसी खुले रास्ते से होते हैं। गृह मंत्री ने 189 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का लोकार्पण कर एक बड़ा संदेश दिया है कि अब जवानों को बेहतर सड़क, बेहतर बैरक और बेहतर निगरानी के साधन मिलेंगे। लेकिन केवल पैसा देना काफी नहीं है। सवाल यह है कि क्या हम इस खुले बॉर्डर को बिना मित्रता तोड़े सुरक्षित बना सकते हैं? इसका जवाब है त्रिकोणीय सुरक्षा ग्रिड।
त्रिकोणीय ग्रिड का मतलब है एसएसबी, बीएसएफ और राज्य पुलिस के बीच रीयल टाइम खुफिया जानकारी का साझा होना। ड्रोन, सैटेलाइट और मानव खुफिया तंत्र का एक साथ काम करना। अब तक ये एजेंसियां अलग-अलग काम करती थीं। अब इन्हें एक ही कंट्रोल रूम से जोड़ा जा रहा है। यह एक क्रांतिकारी कदम है।
लेकिन असली लड़ाई जमीन पर है। पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश सीमा पर 600 किलोमीटर से ज्यादा फेंसिंग का काम सालों से रुका था, क्योंकि जमीन नहीं मिल रही थी। गृह मंत्री का यह कहना कि सरकार बनने के 45 दिन में ही 1129 एकड़ जमीन मिल गई, यह बताता है कि पहले इच्छाशक्ति की कमी थी। राष्ट्रीय सुरक्षा को वोट बैंक की राजनीति की बलि चढ़ाया जा रहा था। बाड़ लगने से घुसपैठ रुकेगी और जब घुसपैठ रुकेगी तो जनसांख्यिकीय संतुलन बिगड़ने का खतरा भी टलेगा।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर को समझने के लिए बांग्लादेश और चीन की नई दोस्ती को भी समझना होगा। बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद वहां चीन का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। चीन चाहता है कि वह बंगाल की खाड़ी तक पहुंच बनाए और इसके लिए वह चिकन नेक के करीब अपना दबदबा बढ़ाना चाहता है।
यदि किसी युद्ध या तनाव की स्थिति में यह कॉरिडोर कट गया तो असम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम भारत से कट जाएंगे। सेना का रसद मार्ग बंद हो जाएगा। हवाई मार्ग भी चीन की मिसाइल रेंज में आ जाएगा। यही कारण है कि चीन के रणनीतिकार हमेशा इस कॉरिडोर को काटने की योजना बनाते हैं।
सिलीगुड़ी को केवल बंकर और बाड़ से नहीं बचाया जा सकता। इसे बचाने के लिए वहां के लोगों का दिल जीतना होगा। पूर्वोत्तर के लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि दिल्ली उनके साथ है। इसलिए सड़क, रेल और हवाई कनेक्टिविटी का विस्तार जरूरी है। वैकल्पिक मार्गों का निर्माण जरूरी है। सरकार को एक दूसरे कॉरिडोर पर भी सोचना होगा, जो नेपाल या बांग्लादेश से होकर नहीं, बल्कि भारत के भीतर से ही पूर्वोत्तर को जोड़े। यह काम कठिन है, लेकिन असंभव नहीं है। साथ ही स्थानीय युवाओं को रोजगार देकर उन्हें सुरक्षा ग्रिड का हिस्सा बनाना होगा।
अमित शाह का बयान एक चेतावनी भी है और संकल्प भी। चेतावनी इस बात की कि दुश्मन हमारी सबसे कमजोर नस को दबाना चाहता है और संकल्प इस बात का कि हम उसे कामयाब नहीं होने देंगे। सिलीगुड़ी कॉरिडोर केवल पश्चिम बंगाल का मुद्दा नहीं है। यह पूरे भारत की संप्रभुता का सवाल है।
आज इस 22 किलोमीटर की पट्टी को सुरक्षित नहीं कर पाए तो कल 22 हजार किलोमीटर की सीमा को सुरक्षित करने की बात बेमानी हो जाएगी। इसलिए इस पर राजनीति बंद होनी चाहिए। केंद्र और राज्य को एक साथ आना होगा, क्योंकि जब चिकन नेक सुरक्षित है, तभी भारत का माथा ऊंचा है।















