इंदौर, 25 अगस्त।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने भागीरथपुरा दूषित पानी मामले की जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि रिपोर्ट की प्रति सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं कराई जाएगी और इसे केवल मामले में वकालतनामा दाखिल करने वाले वकील ही देख सकेंगे।
भागीरथपुरा दूषित पानी कांड को लेकर मंगलवार को हुई सुनवाई में पीड़ितों की ओर से दायर जनहित याचिका पर चर्चा हुई। याचिकाकर्ताओं के वकील रितेश इनानी ने न्यायालय से करीब 600 पन्नों की जांच रिपोर्ट अध्ययन के लिए उपलब्ध कराने की मांग की थी। अदालत ने कहा कि रिपोर्ट का सार्वजनिक प्रसार नहीं किया जा सकता। रिपोर्ट उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार को सौंप दी गई है और संबंधित वकील रजिस्ट्रार कार्यालय में जाकर इसका अध्ययन कर सकते हैं।
सुनवाई के दौरान भागीरथपुरा मामले के साथ इंदौर में सामने आ रहे दूषित पानी की समस्याओं का मुद्दा भी उठाया गया। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि शहर के कुछ हिस्सों में अब भी दूषित पानी की आपूर्ति की शिकायतें मिल रही हैं।
उन्होंने दूषित पानी के नमूनों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में कार्रवाई की जरूरत है। इस पर अदालत ने नगर निगम से पूछा कि दूषित पानी की समस्या को लेकर अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और कई क्षेत्रों में साफ पानी की आपूर्ति क्यों नहीं हो पा रही है। नगर निगम ने जवाब देने के लिए समय मांगा, जिसे अदालत ने मंजूर कर लिया।
भागीरथपुरा इलाके में 26 दिसंबर 2025 से 25 फरवरी 2026 के बीच दूषित पानी पीने से 36 लोगों की मौत हुई थी, जबकि बड़ी संख्या में लोग बीमार हुए थे। इस घटना ने इंदौर सहित पूरे प्रदेश में प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए थे और राजनीतिक स्तर पर भी प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं।
इस मामले की जांच के लिए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के निर्देश पर गठित एक सदस्यीय जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट तैयार की थी। आयोग ने 20 अगस्त को करीब 600 पन्नों की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में उच्च न्यायालय में जमा की थी।
27 जनवरी 2026 को सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में गठित आयोग ने मामले के विभिन्न पहलुओं की जांच की। जांच के दौरान संबंधित विभागों से दस्तावेज जुटाए गए और प्रभावित लोगों के बयान भी दर्ज किए गए।
आयोग ने इंदौर नगर निगम, इंदौर विकास प्राधिकरण, जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग सहित कई विभागों से जानकारी ली। इसके अलावा अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका, राहत कार्यों तथा स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्था की भी समीक्षा की गई। संवेदनशील मामला होने के कारण जांच प्रक्रिया को गोपनीय रखा गया।
जांच केवल दूषित पानी के स्रोत या पाइपलाइन तक सीमित नहीं रही, बल्कि आयोग ने यह भी जांच की कि संबंधित अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारियों का पालन किया था या नहीं। तत्कालीन निगम आयुक्त दिलीप यादव, तत्कालीन अपर आयुक्त टोहित सिसोनिया, कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव, स्थानीय पार्षद कमल वाघेला सहित अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में रही।















