नई दिल्ली, 25 अगस्त।
पंजाब में भाजपा और अकाली दल के बीच गठबंधन की संभावना सीट फॉर्मूले पर आकर टिक गई है।
नई दिल्ली। पंजाब में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन की संभावनाएं सीट शेयरिंग के फॉर्मूले पर आकर टिक गई हैं। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व फिलहाल गठबंधन पर खुलकर कुछ नहीं कह रहा है, वहीं पार्टी की पंजाब इकाई अपने दम पर विधानसभा चुनाव लड़ने की पैरवी कर रही है। गौरतलब है कि पार्टी सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कहती आ रही है। हालांकि, पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिरोमणि अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात और इसके बाद अकाली दल का महिला आरक्षण विधेयक के समर्थन में खड़ा होना, दोनों दलों के बीच बढ़ती नजदीकी के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
शहरी और ग्रामीण प्रभाव गठजोड़ के पक्ष में
दोनों दलों के रणनीतिकार मानते हैं कि पंजाब में भाजपा और अकाली दल का गठबंधन चुनावी तौर पर मजबूत साबित हो सकता है। भाजपा को राज्य के शहरी इलाकों में मजबूत माना जाता है, जबकि अकाली दल की पकड़ ग्रामीण और पारंपरिक सिख मतदाताओं के बीच रही है। ऐसे में दोनों दलों का सामाजिक और भौगोलिक आधार एक-दूसरे का पूरक बन सकता है। कांग्रेस में चल रही अंतर्कलह और आम आदमी पार्टी के खिलाफ बन रही लहर को देखते हुए भाजपा और अकाली दल को लगता है कि यह सही समय है, जब वे मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं।
सबसे बड़ी अड़चन सीटों के बंटवारे को लेकर है। अकाली दल पहले भाजपा को 23 विधानसभा सीटें देता रहा है और इसी फॉर्मूले को आगे बढ़ाने की इच्छा रखता है। भाजपा अब इस संख्या से काफी आगे बढ़कर सीटों पर दावा कर रही है। पार्टी के रणनीतिकारों की ओर से 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के पहले या दूसरे स्थान पर रहने वाली 54 विधानसभा सीटों को संभावित दावे के आधार के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी के मुताबिक, पहले भी पार्टी एक बार 23 में से 17 सीटें जीत चुकी है। अभी कांग्रेस में असंतोष और आप के विरोध में चल रही लहर के चलते पार्टी अच्छी सीटें जीत सकने की स्थिति में है।
अकाली दल यदि ज्यादा सीटें भाजपा को देता है तो उसके अपने जनाधार पर असर पड़ सकता है। अकाली दल का मानना है कि उसका कोर वोट बैंक सिख ग्रामीण मतदाता है और वह किसी भी कीमत पर अपने प्रभाव वाले इलाकों में भाजपा को ज्यादा जगह नहीं देना चाहता। यही कारण है कि पुराने फॉर्मूले पर ही बातचीत अटकी हुई है।
एक पूर्व मंत्री और एक केंद्रीय मंत्री के बीच अनौपचारिक स्तर पर बातचीत हो रही है। भाजपा के एक अन्य नेता के मुताबिक, पार्टी की आंतरिक चर्चाओं में करीब 40 से 47 विधानसभा सीटों को भाजपा के प्रभाव वाली मजबूत सीटों के तौर पर चिन्हित किया गया है। ऐसे में भाजपा के लिए पुराने 23 सीटों के फॉर्मूले पर लौटना आसान नहीं होगा। पार्टी का तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में उसका संगठन और चुनावी प्रभाव पंजाब में बढ़ा है। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ा है और शहरी क्षेत्रों में पार्टी ने अच्छी पकड़ बनाई है।
पार्टी के भीतर एक धड़ा ऐसा भी है, जो मानता है कि अकेले चुनाव लड़ने से पार्टी का अपना जनाधार स्पष्ट होगा और भविष्य में वह बड़ी भूमिका में आ सकेगी। पंजाब इकाई का कहना है कि यदि गठबंधन होता भी है तो सम्मानजनक सीटों पर ही होना चाहिए। 23 सीटों पर समझौता करना कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ सकता है।
भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व इस मुद्दे पर बेहद सावधानी से कदम रख रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति रही है कि पहले जमीनी स्थिति का आकलन किया जाए और फिर अंतिम फैसला लिया जाए। सुखबीर सिंह बादल से मुलाकात को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। भाजपा नहीं चाहती कि पंजाब में उसे फिर से अकाली दल के जूनियर पार्टनर के रूप में देखा जाए, वहीं अकाली दल भी नहीं चाहता कि भाजपा के कारण उसका पंथक वोट बैंक नाराज हो जाए।
पिछले विधानसभा चुनावों में अकाली दल और भाजपा अलग-अलग लड़े थे और दोनों को नुकसान हुआ था। अकाली दल को 2022 में केवल तीन सीटें मिली थीं, जबकि भाजपा को दो सीटों पर संतोष करना पड़ा था। इसके बाद दोनों दलों को एहसास हुआ कि अलग-अलग लड़ने से कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को फायदा होता है। इसलिए इस बार गठबंधन की चर्चा फिर तेज हुई है।
फिलहाल दोनों दलों के बीच अनौपचारिक बातचीत जारी है और आने वाले महीनों में तस्वीर साफ हो सकती है। यदि सीट शेयरिंग पर बात बनी तो एक साथ होंगे भाजपा-अकाली। यह तय है कि पंजाब की राजनीति में भाजपा और अकाली दल का गठबंधन एक बड़ा फैक्टर बन सकता है। लेकिन सवाल वही है कि क्या भाजपा 23 सीटों के पुराने फॉर्मूले को छोड़ने को तैयार होगी और क्या अकाली दल 40 से ज्यादा सीटें देने को तैयार होगा?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अंत में दोनों दलों को बीच का रास्ता निकालना होगा। भाजपा को 30 से 35 सीटों पर मानना पड़ सकता है और अकाली दल को भी थोड़ा लचीला होना पड़ेगा, क्योंकि दोनों का साझा दुश्मन इस समय आम आदमी पार्टी है। यदि दोनों अलग-अलग लड़े तो इसका सीधा फायदा आप और कांग्रेस को मिलेगा।
पंजाब चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन गठबंधन की सुगबुगाहट ने सियासत गरमा दी है। सीट शेयरिंग की अड़चन के बावजूद दोनों दलों के बीच नजदीकी बढ़ रही है। शहरी और ग्रामीण का यह गठजोड़ यदि बनता है तो पंजाब की चुनावी तस्वीर बदल सकती है। अब देखना यह है कि भाजपा अपनी पंजाब इकाई की भावना को मानती है या केंद्रीय नेतृत्व अकाली दल के साथ पुराने संबंधों को फिर से मजबूत करने का फैसला करता है।















