नई दिल्ली, 25 अगस्त।
सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना आज अपने ही लक्ष्य से भटकती दिख रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले चार साल में 73 लाख किसानों ने इस योजना को छोड़ा है और करीब 388 लाख हेक्टेयर रकबा बीमा से बाहर हो गया है। यह सामान्य गिरावट नहीं, बल्कि किसानों के भरोसे में आई कमी है।
तालिका पर गौर करें तो 2023 में 240 लाख किसान बीमित थे। 2024 में यह संख्या 247 लाख हुई, लेकिन 2025 में गिरकर 201 लाख और 2026 में मात्र 174 लाख रह गई। प्रीमियम संग्रह और भुगतान के आंकड़ों में भी बड़ा अंतर है। किसानों का आरोप है कि बीमा कंपनियां प्रीमियम लेने में सबसे आगे, लेकिन भुगतान के समय सबसे पीछे रहती हैं। गांवों में सर्वे के नाम पर खानापूर्ति होती है, क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट देर से होते हैं और तकनीकी खामियों का हवाला देकर क्लेम रोक दिया जाता है।
कई राज्यों में बीमा कंपनियों ने आपत्तियां लगाई हैं। कहीं पोर्टल बंद होने का बहाना, तो कहीं दस्तावेज अधूरे होने का तर्क दिया जाता है। किसान चक्कर लगाते-lगाते थक जाता है और अंत में योजना से ही बाहर हो जाता है।
जटिल प्रक्रिया भी किसानों की परेशानी बढ़ाती है। कई बार बैंक प्रीमियम काट लेता है, लेकिन रसीद नहीं देता। नुकसान होने पर पता चलता है कि बीमा ही नहीं हुआ। अतिवृष्टि, ओलावृष्टि और सूखे के बाद किसान को तुरंत मदद चाहिए, लेकिन क्लेम छह महीने से सालभर बाद आता है। कई बार पूरे गांव की फसल बर्बाद होने के बावजूद कुछ किसानों को ही आंशिक भुगतान मिलता है।
सरकार को तीन कड़े कदम उठाने चाहिए। पहला, समय पर क्लेम न देने वाली कंपनियों पर जुर्माना और ब्लैकलिस्ट की व्यवस्था हो। दूसरा, सर्वे प्रक्रिया में किसान संगठनों और पंचायतों की भागीदारी हो। तीसरा, भुगतान सीधे डीबीटी से और समयबद्ध हो।
73 लाख किसानों का योजना छोड़ना खतरे की घंटी है। यदि समय रहते जवाबदेही तय नहीं हुई तो किसान बीमा को सुरक्षा नहीं, बोझ समझने लगेगा।














