भोपाल, 26 अगस्त।
देश में त्योहार आते ही मिलावटी खाद्य पदार्थों के खिलाफ कार्रवाई की खबरें सामने आने लगती हैं। रक्षाबंधन के बाद जन्माष्टमी, दशहरा और दीपावली आएंगे और फिर वही तस्वीर दिखाई देगी - मावा जब्त, पनीर नष्ट, घी में मिलावट पकड़ी गई। मध्यप्रदेश में 561 करोड़ रुपये का माल पकड़े जाने का दावा है तो महाराष्ट्र में 56 करोड़ का। दिल्ली से चेन्नई तक सिंथेटिक दूध, यूरिया वाला पनीर और मिलावटी घी की खबरें सामने आती रहती हैं। सवाल यह नहीं है कि मिलावट हो रही है, सवाल यह है कि यह जहर जनता की थाली तक पहुंच ही कैसे रहा है? यदि जहर बांटने वाले सफल हो रहे हैं तो सरकारी अमला क्या कर रहा है?
मिलावट अब केवल किसी छोटे दुकानदार का खेल नहीं रह गई है। यह एक संगठित नेटवर्क का रूप ले चुकी है। कहीं सिंथेटिक दूध के टैंकर तैयार होते हैं, कहीं नकली मावा और पनीर बनाया जाता है। फिर यह माल बसों, ट्रेनों और निजी वाहनों से दूसरे राज्यों और शहरों तक पहुंचता है। सीमाओं पर प्रभावी जांच और नाकों पर पर्याप्त खाद्य परीक्षण व्यवस्था नहीं होने का फायदा मिलावटखोर उठाते हैं। ग्वालियर में जब्त पनीर यदि बाहर से आया था तो यह साफ संकेत है कि समस्या केवल स्थानीय दुकानों तक सीमित नहीं है।
देश में खाद्य सुरक्षा की जिम्मेदारी भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण और राज्यों के खाद्य सुरक्षा विभागों की है। कानून है, लाइसेंस व्यवस्था है, नमूने लेने का अधिकार है और अदालतें भी हैं। इसके बावजूद मिलावट क्यों नहीं रुकती? सबसे बड़ी समस्या कार्रवाई का त्योहार-केंद्रित होना है। विभाग त्योहार से कुछ सप्ताह पहले सक्रिय होता है और फिर अभियान समाप्त होते ही व्यवस्था पुरानी गति पर लौट आती है। मिलावटखोर इस व्यवस्था को अच्छी तरह समझते हैं और पूरे साल माल तैयार कर त्योहारों में खपा देते हैं।
दूसरी समस्या छोटी मछली पर कार्रवाई और बड़ी मछली तक न पहुंचना है। हजारों नमूने लेने, नोटिस जारी करने और कुछ लाइसेंस निलंबित करने से यदि बड़े उत्पादन केंद्र सुरक्षित रहें तो ऐसी कार्रवाई का असर सीमित ही रहेगा। असली सवाल उन फैक्ट्रियों तक पहुंचने का है जहां बड़े पैमाने पर मिलावटी दूध, पनीर और मावा तैयार होता है।
परिवहन और पुलिस विभाग की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। यदि मिलावटी माल एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंच रहा है तो रास्ते में उसकी जांच क्यों नहीं होती? स्थानीय प्रशासन और नगर निकायों को भी बिना लाइसेंस चलने वाली इकाइयों पर कार्रवाई करनी होगी। उपभोक्ता की जिम्मेदारी भी है कि वह अत्यधिक सस्ते उत्पादों के लालच से बचे, बिल ले और संदेह होने पर शिकायत करे।
महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर प्रतिष्ठानों की जांच और लाइसेंस निलंबन जैसी कार्रवाई बताती है कि इच्छाशक्ति हो तो व्यवस्था प्रभावी हो सकती है। मध्यप्रदेश सहित सभी राज्यों को भी त्योहारों तक सीमित अभियान के बजाय सालभर निगरानी की व्यवस्था बनानी होगी। सीमाओं पर मोबाइल खाद्य प्रयोगशालाएं, रात में जांच, बड़े खाद्य प्रतिष्ठानों की नियमित निगरानी और उत्पादन इकाइयों की जवाबदेही जरूरी है।
मिलावट केवल कानून तोड़ने का मामला नहीं है, यह लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ है। धीमा जहर तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन लंबे समय में गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकता है। सरकार को आंकड़ों और जब्ती की संख्या से आगे बढ़कर यह सुनिश्चित करना होगा कि मिलावट की जड़ पर प्रहार हो। अफसरों की जवाबदेही तय हो और दोषियों को ऐसी सजा मिले कि थाली में जहर परोसने की हिम्मत कोई न करे। वरना हर त्योहार पर आंकड़े बदलेंगे, लेकिन जनता की थाली में जहर का खतरा बना रहेगा।














