नई दिल्ली, 26 अगस्त।
भारतीय जनता पार्टी ने जब से केंद्र में दूसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई है, तब से उसके कोर एजेंडे एक के बाद एक पूरे होते जा रहे हैं। राम मंदिर निर्माण और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने जैसे ऐतिहासिक फैसले धरातल पर उतर चुके हैं। अब पार्टी अपने बाकी तीन बड़े वादे - एक देश, एक चुनाव, महिला आरक्षण और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को पूरा करने की दिशा में निर्णायक बढ़त लेने जा रही है। इसमें सबसे ज्यादा चर्चा एक देश, एक चुनाव की है।
संसद में लंबित संविधान संशोधन विधेयक पारित होने की स्थिति में सरकार की आधिकारिक योजना एक देश, एक चुनाव की व्यवस्था 2034 से लागू करने की है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चल रही हलचल कुछ और ही कहानी कह रही है। एनडीए नेतृत्व 2034 का इंतजार नहीं करना चाहता। वह चाहता है कि 2029 में ही इस व्यवस्था का ट्रेलर दिखा दिया जाए। इसके लिए सबसे उपयुक्त प्रयोगशाला हैं भाजपा और एनडीए शासित राज्य।
दिसंबर 2028 वाला पेंच और 2029 वाला हलमध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान - इन तीनों राज्यों की वर्तमान विधानसभाओं का कार्यकाल दिसंबर 2028 में खत्म हो रहा है। लोकसभा का कार्यकाल जून 2029 तक है। यानी दोनों के बीच केवल पांच से छह महीने का अंतर है। इसी अंतर को पाटकर एक देश, एक चुनाव की नींव रखी जा सकती है।
सरकार के सामने चुनौती यह है कि यदि दिसंबर 2028 में इन तीनों बड़े राज्यों में अलग से चुनाव करवाए जाते हैं तो फिर 2029 के लोकसभा चुनाव के सिर्फ पांच महीने पहले एक बड़ा चुनावी माहौल बनेगा। इससे सरकारी संसाधनों पर दोहरा बोझ पड़ेगा और बार-बार आचार संहिता से विकास कार्य ठप होंगे। इसलिए रणनीतिकारों ने तीन संभावनाओं पर काम शुरू कर दिया है।
पहली संभावना - मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की विधानसभाओं का कार्यकाल खत्म होने के बाद वहां चुनाव न कराकर तीन से चार महीने के लिए राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए और फिर मार्च-अप्रैल 2029 में लोकसभा के साथ ही इन तीनों राज्यों के विधानसभा चुनाव भी करवा दिए जाएं। इससे एक देश, एक चुनाव की परोक्ष शुरुआत 2029 से ही हो जाएगी और जनता को भी दो बार वोट डालने की परेशानी से मुक्ति मिलेगी।
दूसरी संभावना छह महीने में ही विधानसभा भंग करने की थोड़ी आक्रामक है। इसके तहत दिसंबर 2028 में तय समय पर तीनों राज्यों में चुनाव करा लिए जाएं, लेकिन नई सरकारों को केवल छह महीने के लिए ही जनादेश दिया जाए और फिर जून 2029 में उन्हें भंग कर लोकसभा के साथ दोबारा चुनाव करा लिए जाएं। यह प्रयोग पहले भी कुछ छोटे राज्यों में हो चुका है। हालांकि इससे छह महीने में दो बार चुनाव का खर्च बढ़ेगा, लेकिन दीर्घकालीन लक्ष्य के लिए यह कुर्बानी छोटी मानी जा रही है।
2033 वाला फार्मूला सबसे तकनीकी है। इसमें 2028 में चुनाव समय पर होते हैं। फिर 2033 में इन विधानसभाओं का कार्यकाल पांच साल पहले ही खत्म कर दिया जाता है और फिर एक साल तक राष्ट्रपति शासन लगाकर 2034 में लोकसभा के साथ चुनाव कराए जाते हैं। यह फार्मूला उन राज्यों के लिए ज्यादा उपयुक्त माना जा रहा है, जहां सरकारें स्थिर हैं और बार-बार चुनाव का बोझ नहीं उठाना चाहतीं।
कौन-कौन से राज्य आएंगे 2029 की लहर मेंलोकसभा चुनाव 2029 के साथ चार राज्यों के चुनाव तो तय हैं। अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, सिक्किम और ओडिशा में लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव होने हैं।
इसके अलावा भाजपा शासित राज्यों में कार्यकाल घटा-बढ़ाकर चुनाव को 2029 के साथ लाने की तैयारी है। हरियाणा और महाराष्ट्र में छह माह पहले, दिल्ली में एक साल पहले, बिहार में डेढ़ साल पहले तथा पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में करीब दो साल पहले चुनाव कराने होंगे।
एनडीए के सहयोगी दलों वाले राज्य जैसे त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड और मिजोरम में 2028 में चुनाव होने हैं। वहां भी राष्ट्रपति शासन या कार्यकाल विस्तार से 2029 के साथ समायोजन किया जा सकता है।
2027 में जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, जैसे उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और गुजरात, वहां अगली सरकार के कार्यकाल पर फैसला निर्भर करेगा कि उसे 2029 तक खींचा जाए या 2034 तक।
विपक्ष शासित राज्यों का क्या होगा?विपक्ष शासित राज्यों जैसे कर्नाटक, हिमाचल, तेलंगाना और तमिलनाडु का क्या होगा? सूत्रों का कहना है कि संविधान संशोधन में यह प्रावधान होगा कि यदि कोई राज्य विधानसभा तय समय से पहले भंग होती है तो उसका अगला कार्यकाल केवल बचे हुए समय के लिए होगा, ताकि धीरे-धीरे सभी राज्य 2029 या 2034 के चक्र में आ जाएं।
यानी विपक्षी राज्यों को भी अंततः इसी व्यवस्था में आना होगा।
जेपीसी रिपोर्ट और शीत सत्र का महत्वएक देश, एक चुनाव पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) ने अपनी रिपोर्ट तैयार कर ली है और इसे संसद के शीत सत्र में पेश किया जाना है।
यदि यह विधेयक दोनों सदनों से पारित हो जाता है तो 2034 में एक देश, एक चुनाव लागू होना संवैधानिक रूप से अनिवार्य हो जाएगा। लेकिन उससे पहले ही एनडीए शासित राज्यों में इसका प्रयोग शुरू कर परोक्ष रूप से 2029 से ही व्यवस्था को लागू कर दिया जाएगा।
यह केवल चुनाव सुधार नहीं, सत्ता की स्थायी रणनीति हैएक देश, एक चुनाव को केवल चुनाव सुधार के चश्मे से देखना भूल होगी। यह भाजपा की उस दीर्घकालीन रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह बार-बार चुनाव से होने वाले जातीय ध्रुवीकरण और मुफ्त की योजनाओं की होड़ को खत्म करना चाहती है।
उसका तर्क है कि यदि एक बार में ही केंद्र और राज्य की सरकारें चुन ली जाएं तो सरकारें पांच साल तक बिना किसी चुनावी दबाव के विकास कर पाएंगी।
यदि मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में 2029 में लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव होते हैं तो यह भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रयोग होगा।
यह प्रयोग सफल रहा तो 2034 तक भारत में हर पांच साल में केवल एक बार महाचुनाव होगा और बार-बार चुनाव का दौर हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।















